Kharsawan Goli Kand : 1 जनवरी 1948 का खरसावां कांड !
प्रस्तावना
Kharsawan Goli Kand : भारत की आज़ादी को आम तौर पर 15 अगस्त 1947 से जोड़ा जाता है, लेकिन आज़ादी के बाद का पहला दशक भी संघर्ष, हिंसा और सत्ता-निर्माण की पीड़ा से भरा हुआ था। इसी दौर में, 1 जनवरी 1948 को वर्तमान झारखंड के खरसावां में घटित खरसावां कांड भारतीय इतिहास की उन सबसे त्रासद घटनाओं में से एक है, जिसे न तो राष्ट्रीय पाठ्यपुस्तकों में पर्याप्त स्थान मिला और न ही राजनीतिक विमर्श में।
खरसावाँ गोलीकांड, भारत के बिहार राज्य (अब झारखण्ड में) के सिंहभूम में खरसावॉं हाट मैदान में 1 जनवरी 1948 को हुआ था। सराइकेला खरसावाँ जिले के खरसावॉं हाट मैदान में सराइकेला और खरसावॉं रियासत का ओडिशा में विलय के खिलाफ और अलग झारखण्ड राज्य की मांग को लेकर आदिवासियों की एक बड़ी, शांतिपूर्ण भीड़ विरोध करने के लिए एकत्र हुई थी। जिन पर ओडिशा पुलिस बल ने मशीनगन द्वारा गोलियां बरसाई गई। डॉ. राममनोहर लोहिया ने इसे “दूसरा जालियांवाला बाग हत्याकांड” बताया।
यह केवल एक गोलीकांड नहीं था, बल्कि यह आदिवासी अस्मिता, स्वायत्तता और लोकतांत्रिक अधिकारों पर सीधा प्रहार था। यह लेख खरसावां कांड को ऐतिहासिक संदर्भ, घटनाक्रम (टाइमलाइन), सामाजिक प्रभाव, उद्धरणों और विश्लेषण के साथ विस्तार से प्रस्तुत करता है।

भाग 1 – Kharsawan Goli Kand : खरसावां रियासत और आदिवासी समाज की पृष्ठभूमि
1.1 खरसावां रियासत का इतिहास
खरसावां एक छोटी लेकिन सांस्कृतिक रूप से समृद्ध रियासत थी। यहाँ मुख्यतः हो, मुंडा, संथाल और उरांव जैसे आदिवासी समुदाय निवास करते थे।
इन समुदायों की सामाजिक व्यवस्था की प्रमुख विशेषताएँ थीं:
- सामूहिक भूमि व्यवस्था
- ग्राम सभा आधारित निर्णय प्रणाली
- परंपरागत न्याय व्यवस्था
- जल–जंगल–जमीन से गहरा संबंध
ब्रिटिश काल में भी इन क्षेत्रों में प्रत्यक्ष औपनिवेशिक हस्तक्षेप अपेक्षाकृत कम था।
1.2 आदिवासी स्वशासन की अवधारणा
आदिवासी समाज के लिए “राज्य” केवल प्रशासनिक इकाई नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक होता है।
खरसावां के लोग मानते थे कि:
“हमारी जमीन पर शासन करने का अधिकार हमें है, न कि किसी दूर बैठे प्रशासन को।”
भाग 2- Kharsawan Goli Kand : आज़ादी के बाद का राजनीतिक परिदृश्य
2.1 1947–48: संक्रमण का समय
भारत की आज़ादी के साथ ही 560 से अधिक रियासतों के विलय की प्रक्रिया शुरू हुई।
इस प्रक्रिया में:
- प्रशासनिक जल्दबाज़ी
- स्थानीय सहमति की कमी
- केंद्र और राज्यों का दबाव
स्पष्ट दिखाई देता है।
2.2 बिहार में विलय का निर्णय
खरसावां को तत्कालीन बिहार राज्य में मिलाने का निर्णय लिया गया।
आदिवासी समाज की मुख्य आपत्तियाँ थीं:
- उनकी सांस्कृतिक पहचान कमजोर हो जाएगी
- बाहरी प्रशासन भूमि कानून बदलेगा
- खनिज और जंगलों का दोहन बढ़ेगा
भाग 3- Kharsawan Goli Kand : 1 जनवरी 1948 – घटनाक्रम (टाइमलाइन)
🕘 सुबह 7:00–9:00
आस-पास के गाँवों से हजारों आदिवासी खरसावां पहुँचना शुरू करते हैं।
🕙 सुबह 10:00
शांतिपूर्ण सभा प्रारंभ होती है। लोग पारंपरिक वेशभूषा में, बिना हथियार।
🕛 दोपहर 12:00
प्रशासन को “स्थिति बिगड़ने” की आशंका बताई जाती है।
🕐 दोपहर 1:00
भीड़ को हटाने का आदेश दिया जाता है।
🕜 दोपहर 1:30
अचानक पुलिस फायरिंग शुरू होती है।
🕓 शाम 4:00
इलाका खाली, शवों को हटाया जाता है।
भाग 4- Kharsawan Goli Kand : गोलीकांड और उसकी भयावहता
4.1 प्रत्यक्षदर्शियों के बयान
एक स्थानीय बुजुर्ग के अनुसार:
“लोग भाग रहे थे, बच्चे रो रहे थे, और गोलियाँ रुकने का नाम नहीं ले रही थीं।”
4.2 महिलाओं और बच्चों पर प्रभाव
- कई महिलाएँ विधवा हो गईं
- अनगिनत बच्चे अनाथ
- सामाजिक संरचना बिखर गई
भाग 5- Kharsawan Goli Kand : मृतकों की संख्या – एक अनसुलझा प्रश्न
5.1 आधिकारिक आंकड़े
सरकारी रिकॉर्ड में मृतकों की संख्या दर्जनों में बताई गई।
5.2 स्थानीय समाज का दावा
स्थानीय समुदाय और इतिहासकारों के अनुसार:
- 300 से अधिक मौतें
- कुछ आकलन 1000+ तक
“जब शवों की गिनती ही नहीं हुई, तो आंकड़ा कैसे तय होगा?”
भाग 6- Kharsawan Goli Kand : प्रशासनिक प्रतिक्रिया और न्याय का अभाव
6.1 जाँच की कमी
- कोई स्वतंत्र आयोग नहीं
- दोषियों पर कार्रवाई नहीं
6.2 मुआवज़े का सवाल
पीड़ित परिवारों को:
- न पर्याप्त मुआवज़ा
- न आधिकारिक माफी
भाग 7- Kharsawan Goli Kand : दीर्घकालिक सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव
7.1 आदिवासी–राज्य संबंध
इस घटना के बाद:
- अविश्वास गहरा हुआ
- राज्य को “बाहरी शक्ति” माना जाने लगा
7.2 झारखंड आंदोलन से संबंध
खरसावां कांड ने बाद में उभरे झारखंड आंदोलन को वैचारिक ऊर्जा दी।
भाग 8- Kharsawan Goli Kand : जलियाँवाला बाग से तुलना
| पहलू | जलियाँवाला बाग | खरसावां |
|---|---|---|
| शासन | ब्रिटिश | स्वतंत्र भारत |
| पीड़ित | शहरी नागरिक | आदिवासी |
| पहचान | राष्ट्रीय | सीमित |
यह तुलना सवाल उठाती है:
क्या कुछ शहादतें कम महत्वपूर्ण मानी गईं?
भाग 9- Kharsawan Goli Kand : स्मृति, शहीद स्थल और आज का खरसावां
आज खरसावां में शहीद स्थल पर हर साल 1 जनवरी को:
- श्रद्धांजलि
- सांस्कृतिक कार्यक्रम
- इतिहास चर्चा
आयोजित होती है।
निष्कर्ष
खरसावां कांड केवल अतीत की घटना नहीं, बल्कि आज भी प्रासंगिक सवाल खड़ा करता है:
- लोकतंत्र में असहमति का क्या मूल्य है?
- क्या आदिवासी आवाज़ को समान महत्व मिला?
“जो इतिहास नहीं लिखा जाता, वह बार-बार दोहराया जाता है।”
