मीनाक्षी नटराजन को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका, राज्यसभा नामांकन रद्द करने के खिलाफ याचिका खारिज
नई दिल्ली: मध्य प्रदेश से कांग्रेस की राज्यसभा उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत नहीं मिल सकी। शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने उनकी उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने चुनाव आयोग और रिटर्निंग ऑफिसर द्वारा उनके नामांकन पत्र को रद्द किए जाने के फैसले को चुनौती दी थी।
सुप्रीम कोर्ट की न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदुरकर की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट कहा कि एक बार किसी उम्मीदवार का नामांकन रद्द हो जाने के बाद उसके पास चुनाव आयोग के समक्ष जाने का विकल्प उपलब्ध होता है। अदालत ने यह भी पूछा कि क्या ऐसा कोई पूर्व फैसला मौजूद है, जिसमें न्यायालय ने चुनाव प्रक्रिया के इस चरण में हस्तक्षेप किया हो।
क्या है पूरा मामला?
मध्य प्रदेश से राज्यसभा चुनाव लड़ रही कांग्रेस नेता मीनाक्षी नटराजन का नामांकन पत्र 9 जून को रिटर्निंग ऑफिसर द्वारा खारिज कर दिया गया था। आरोप लगाया गया कि उन्होंने अपने शपथपत्र में एक आपराधिक मामले से जुड़ी जानकारी का खुलासा नहीं किया था।
नामांकन रद्द होने के बाद नटराजन ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और इस फैसले को चुनौती दी। उनका कहना था कि नामांकन को गलत तरीके से निरस्त किया गया है और चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल खड़े होते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए कहा कि वह इस मामले में सुनवाई नहीं करना चाहता। अदालत ने कहा कि चुनावी प्रक्रिया के दौरान ऐसे मामलों में हस्तक्षेप करने की सीमाएं हैं और उम्मीदवार के पास चुनाव आयोग के समक्ष अपनी शिकायत रखने का विकल्प मौजूद है।
कोर्ट ने यह भी जानना चाहा कि क्या किसी पूर्व मामले में इस तरह की परिस्थिति में अदालत ने चुनाव प्रक्रिया के बीच हस्तक्षेप किया था। हालांकि याचिकाकर्ता की ओर से ऐसा कोई उदाहरण पेश नहीं किया जा सका।
अभिषेक सिंघवी ने रखी दलील
मीनाक्षी नटराजन की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने अदालत में दलील दी कि उम्मीदवारों को केवल उन्हीं आपराधिक मामलों का खुलासा करना होता है, जिनमें न्यूनतम दो वर्ष या उससे अधिक की सजा का प्रावधान हो।
उन्होंने कहा कि जिस मामले को आधार बनाकर नामांकन खारिज किया गया, उसमें केवल समन जारी हुआ था और इसे नामांकन रद्द करने का आधार नहीं बनाया जाना चाहिए था। सिंघवी ने दावा किया कि रिटर्निंग ऑफिसर ने जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के प्रावधानों की गलत व्याख्या की है।
फैसले के बाद क्या बोलीं मीनाक्षी नटराजन?
सुप्रीम कोर्ट से राहत नहीं मिलने के बाद मीनाक्षी नटराजन ने अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यह केवल उनका व्यक्तिगत नुकसान नहीं है, बल्कि भारतीय लोकतंत्र और संविधान के लिए भी चिंता का विषय है।
उन्होंने चुनाव आयोग पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि आयोग और सरकार के बीच सांठगांठ दिखाई देती है। नटराजन ने कहा कि चुनाव आयोग ने उनकी शिकायतों पर समय पर प्रतिक्रिया नहीं दी और 48 घंटे तक कोई जवाब नहीं मिला।
हालांकि उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के प्रति सम्मान जताते हुए कहा कि अदालत ने कम से कम उनका पक्ष सुना और अपना निर्णय सुनाया।
कांग्रेस ने भी उठाए सवाल
इस पूरे घटनाक्रम के बाद कांग्रेस पार्टी ने चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल खड़े किए हैं। पार्टी का आरोप है कि विपक्षी उम्मीदवारों के साथ भेदभाव किया जा रहा है और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर दबाव बढ़ता जा रहा है।
कांग्रेस नेताओं का कहना है कि यह मामला केवल एक उम्मीदवार के नामांकन का नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया की पारदर्शिता और निष्पक्षता से भी जुड़ा हुआ है।
राजनीतिक और कानूनी महत्व
राज्यसभा चुनाव से ठीक पहले आया यह फैसला राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट के इस रुख से यह संकेत भी मिलता है कि चुनावी प्रक्रिया के दौरान न्यायालय आमतौर पर सीमित हस्तक्षेप की नीति अपनाता है और पहले उपलब्ध वैधानिक उपायों का उपयोग करने पर जोर देता है।
अब इस मामले में आगे की कार्रवाई चुनाव आयोग के स्तर पर होने की संभावना है। वहीं राजनीतिक दल इस फैसले को लेकर अपनी-अपनी व्याख्या कर रहे हैं।