खालिदा जिया: एक युग का अंत और भारत-बांग्लादेश संबंधों में नया मोड़
प्रस्तावना: अस्थिरता के दौर में एक विदाई बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री बेगम खालिदा जिया का निधन (30 दिसंबर 2025) एक ऐसे समय में हुआ है जब पड़ोसी देश अपने इतिहास के सबसे कठिन दौर और ‘अराजकता’ से गुजर रहा है। एक तरफ देश राजनीतिक अस्थिरता और हिंदुओं के खिलाफ हिंसा की आग में झुलस रहा है, वहीं दूसरी तरफ द्विपक्षीय संबंधों में गहराता “विश्वास का संकट” भारत के लिए बड़ी रणनीतिक चुनौती बन गया है। खालिदा जिया न केवल बांग्लादेश की पहली महिला प्रधानमंत्री थीं, बल्कि उन्होंने दक्षिण एशियाई राजनीति में एक बेहद प्रभावशाली और विवादास्पद भूमिका निभाई।
1. खालिदा जिया: एक ऐतिहासिक परिचय
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पृष्ठभूमि: खालिदा जिया का जन्म अविभाजित भारत के जलपाईगुड़ी (पश्चिम बंगाल) में हुआ था। उनके पति, जियाउर रहमान, बांग्लादेश के राष्ट्रपति थे, जिनकी हत्या के बाद उन्होंने राजनीति की कमान संभाली।
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लोकतांत्रिक संघर्ष: उन्होंने सैन्य तानाशाही के खिलाफ लंबा संघर्ष किया और 1991 में लोकतांत्रिक तरीके से देश की पहली महिला प्रधानमंत्री बनने का गौरव प्राप्त किया।
2. कार्यकाल और भारत के साथ जटिल संबंध (1991–2006)
बेगम जिया के दो मुख्य कार्यकालों के दौरान दिल्ली और ढाका के बीच संबंधों में अक्सर ‘शीत युद्ध’ जैसी स्थिति रही:
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सुरक्षा चिंताएं: भारत का मानना था कि उनके कार्यकाल (विशेषकर 2001-2006) में बांग्लादेश की धरती का इस्तेमाल ULFA जैसे भारत-विरोधी विद्रोही समूहों द्वारा किया गया।
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पाक-चीन ध्रुवीकरण: खालिदा जिया की सरकार पर अक्सर पाकिस्तान और चीन के प्रति रणनीतिक झुकाव रखने के आरोप लगे, जिससे भारत की चिंताएं बढ़ीं।
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संप्रभुता बनाम कनेक्टिविटी: फरक्का बांध और पारगमन (Transit) अधिकारों जैसे मुद्दों पर उनका रुख सख्त था, जिसे वे राष्ट्रीय संप्रभुता से जोड़कर देखती थीं।
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वैचारिक मतभेद: उनकी पार्टी (BNP) की विचारधारा “बांग्लादेशी राष्ट्रवाद” पर आधारित रही, जो शेख हसीना की अवामी लीग के “बंगाली राष्ट्रवाद” के विपरीत, भारत के प्रति संशयवादी मानी जाती थी।
3. वर्तमान संकट: अराजकता और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा
भारतीय परिप्रेक्ष्य से वर्तमान स्थिति अत्यंत चिंताजनक है:
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सांप्रदायिक हिंसा का तांडव: हाल के दिनों में बांग्लादेश में हिंदुओं के खिलाफ हिंसा के मामले बढ़े हैं। विशेष रूप से 18 दिसंबर 2025 को दीपु चंद्र दास की ईशनिंदा के झूठे आरोपों में नृशंस हत्या ने भारत में गहरा आक्रोश पैदा किया है।
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रणनीतिक खतरा: भारत के लिए बांग्लादेश की स्थिरता सीधे तौर पर उसकी आंतरिक सुरक्षा (विशेषकर उत्तर-पूर्व के सीमावर्ती राज्यों) से जुड़ी है।
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राजनीतिक शून्यता: इस अराजक माहौल में खालिदा जिया का जाना एक शून्य पैदा कर सकता है, जिसका लाभ कट्टरपंथी ताकतें उठा सकती हैं।
4. भारत की सधी हुई ‘नेबरहुड फर्स्ट’ प्रतिक्रिया
खालिदा जिया के साथ ऐतिहासिक तनावों के बावजूद, उनके निधन पर भारत का रुख रणनीतिक रूप से परिपक्व रहा है:
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एस. जयशंकर की ढाका यात्रा: विदेश मंत्री एस. जयशंकर का उनके अंतिम संस्कार (31 दिसंबर 2025) में शामिल होना एक बड़ा कूटनीतिक संकेत है। यह दर्शाता है कि भारत अब किसी एक दल के बजाय बांग्लादेश की संपूर्ण राजनीतिक व्यवस्था के साथ जुड़ना चाहता है।
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भविष्य का नेतृत्व: अब तारिक रहमान BNP की कमान संभाल रहे हैं। भारत को उम्मीद है कि नई परिस्थितियों में BNP अपनी पुरानी ‘भारत-विरोधी’ छवि को त्याग कर एक जिम्मेदार पड़ोसी के रूप में उभरेगी।
5. ‘विश्वास की कमी’ और उभरती चुनौतियां
शेख हसीना के सत्ता से हटने के बाद से दोनों देशों के बीच जो “ट्रस्ट डेफिसिट” पैदा हुआ है, उसके मुख्य कारण हैं:
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एंटी-इंडिया सेंटिमेंट: वीजा सेवाओं का निलंबन और भारतीय दूतावासों के बाहर प्रदर्शन जनता के बीच बढ़ते असंतोष को दर्शाते हैं।
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क्षेत्रीय संतुलन: बांग्लादेश का चीन और पाकिस्तान की ओर बढ़ता झुकाव भारत के लिए ‘चिकन नेक’ (सिक्किम के पास का संकीर्ण गलियारा) की सुरक्षा को लेकर गंभीर चुनौती है।
निष्कर्ष:
खालिदा जिया: एक युग का अंत और भारत-बांग्लादेश संबंधों में नया मोड़
खालिदा जिया का जाना बांग्लादेशी राजनीति में एक युग का अंत है, लेकिन भारत के लिए असली परीक्षा वहां व्याप्त अराजकता और सांप्रदायिक हिंसा को रोकना है। भारत की सर्वोच्च प्राथमिकता यह सुनिश्चित करना है कि फरवरी 2026 में होने वाले चुनाव समावेशी और शांतिपूर्ण हों। दक्षिण एशिया की स्थिरता इस बात पर टिकी है कि ढाका में एक ऐसी लोकतांत्रिक सरकार बने जो अल्पसंख्यकों की रक्षा करे और भारत के साथ “पारस्परिक विश्वास” के सेतु को फिर से निर्मित कर सके।