रक्त, स्याही और बलिदान
1930 का दौर था। बंगाल की हवाओं में बारूद और क्रांति की गंध घुली हुई थी। इसी बीच एक नाम गूंजता था-शौर्य। शौर्य केवल बम और पिस्तौल का खिलाड़ी नहीं था, उसकी असली ताकत उसकी कलम थी। जब वह मंच से अपनी कविताएं पढ़ता, तो युवाओं के लहू में उबाल आ जाता।
वह पहली मुलाक़ात
बनारस के एक एकांत घाट पर स्थित पुराने मंदिर में शौर्य अपनी डायरी लिख रहा था, उस मंदिर का पिछला हिस्सा, जहाँ गंगा की लहरों का शोर इंसानी आवाज़ों को दबा देता था। शाम ढल चुकी थी और मशाल की मद्धम रोशनी में शौर्य अपनी डायरी पर झुका हुआ था। उसके चेहरे पर चोट के निशान थे और आँखों में एक अजीब सी बेचैनी।
उसने ज़ोर से गुनगुनाया:
“मिट्टी की सौगंध है हमको, शीश नहीं झुकने देंगे, रक्त बहेगा स्याही बनकर, लेख नहीं रुकने देंगे!”
“अद्भुत… पर ‘लेख’ की जगह अगर ‘साँस’ होता, तो कविता में वीरता के साथ-साथ समर्पण भी झलकता,” पीछे से एक महीन और साफ़ आवाज़ आई।
शौर्य बिजली की फुर्ती से पलटा, उसके हाथ में पलक झपकते ही छोटी पिस्तौल आ गई। “कौन हों? यहाँ कैसे आई?”
सामने एवलिन खड़ी थी। उसने हल्के नीले रंग का लंबा गाउन पहना था, पर उसके सिर पर भारतीय दुपट्टा लिपटा हुआ था। उसकी भूरी आँखें शौर्य को डर से नहीं, बल्कि एक असीम जिज्ञासा से देख रही थीं।
शौर्य की आवाज़ सख्त थी, “तुम अंग्रेज हो? यहाँ तुम्हारी मौत तुम्हें खींच लाई है या जासूसी का शौक? ” एक के बाद एक प्रश्न?
एवलिन ने निडर होकर एक कदम आगे बढ़ाया और अपने हाथ में दबी एक पुरानी कागज़ की कतरन दिखाई। यह शौर्य की वही कविता थी जो पिछले हफ्ते शहर की दीवारों पर चिपकाई गई थी।
वह धीमी आवाज़ में बोली, “मैं जासूस नहीं हूँ। मेरा नाम एवलिन है। मैं उस दुनिया से आई हूँ जहाँ लोग आज़ादी की बातें तो करते हैं, पर उसे जीने का साहस नहीं रखते। तुम्हारी कविताओं में वह साहस है। मैं बस यह देखना चाहती थी कि जो इंसान इतना दर्दनाक और सुंदर लिखता है, उसकी आँखों में कितना ग़ुस्सा होगा।”
शौर्य ने पिस्तौल नीचे नहीं की, पर उसकी पकड़ ढीली पड़ गई। उसने पहली बार किसी विदेशी चेहरे पर अपनी मातृभूमि के प्रति सम्मान और अपनी आँखों के प्रति इतनी गहरी समझ देखी थी।
“तुम एक एंग्लो-इंडियन हो,” शौर्य ने उसकी वेशभूषा देख कर अंदाज़ा लगाया। “तुम्हारे पिता का नमक किस हुकूमत से आता है। तुम हमसे क्यों मिल रही हो?”
एवलिन मुस्कुराई, पर उस मुस्कुराहट में उदासी थी। “नमक पिता का हो सकता है, पर खून में जो उबाल है, वह इसी मिट्टी का है। ” उस रात गंगा के किनारे, दो अलग दुनिया के लोग एक साथ खड़े थे। एक के पास शब्दों की आग थी, तो दूसरे के पास उन शब्दों को हकीकत में बदलने की विश्वव्यापी दृष्टि। शौर्य को तब अंदाज़ा नहीं था कि जिस लड़की की मासूमियत उसे आज प्रभावित कर रही है, वही कल उसके अहंकार और ईर्ष्या की वजह बनेगी। “तुम्हारे शब्दों में आग है शौर्य, पर क्या तुम जानते हो कि आग को काबू कैसे किया जाता है?” एवलिन ने पहली मुलाकात में ही पूछा था। “मैं केमिस्ट्री (रसायन शास्त्र) की छात्रा रही हूँ। मैं जानती हूँ कि सही मिश्रण से धमाका कैसे होता है और गलत मिश्रण से खुद का विनाश कैसे।” एवलिन संगठन का हिस्सा बन गई। उसने अपनी वैज्ञानिक समझ से क्रांतिकारियों को आधुनिक बम बनाना और गुप्त कोड इस्तेमाल करना सिखाया।
शौर्य को यह रास नहीं आया। उसे लगा कि एक लड़की, और वह भी ‘आधी अंग्रेज’, उसके प्रभाव को कम कर रही है। वह उसके ज्ञान को ‘चालाकी’ और ‘कायरता’ का नाम देने लगा।
एक बड़ा मिशन तय हुआ—शहर के मुख्य शस्त्रागार (Armoury) के पास वाले सामरिक पुल को उड़ाना। शौर्य ने घोषणा की कि वह खुद विस्फोटक लेकर जाएगा और उसे मैन्युअली (हाथ से) ट्रिगर करेगा। एवलिन ने नक्शा देखते ही उसे टोका, “शौर्य, यह आत्महत्या है। जिस तकनीक का तुम इस्तेमाल करना चाहते हो, उसमें भागने का समय नहीं मिलेगा। मैं इसे एक केमिकल टाइमर से सेट कर सकती हूँ, जिससे किसी की जान नहीं जाएगी और काम भी हो जाएगा।”
शौर्य जोर से हँसा और अपने साथियों के सामने उसका मज़ाक उड़ाते हुए बोला, “तकनीक? तुम तकनीक के पीछे छिपकर अपनों को (अंग्रेजों को) बचाना चाहती हो? बलिदान देना हर किसी के बस की बात नहीं होती एवलिन। तुम अंग्रेज की बेटी हो, खून बहाने से डरती हो। हमें तुम्हारी कायरता भरी सलाह की ज़रूरत नहीं।”
एवलिन की आँखों में आँसू आ गए। उसने आहत होकर कहा, “मैं मौत से नहीं डरती, मैं तुम्हें खोने से डरती हूँ।”
पर शौर्य ने उसे अनसुना कर दिया।

अंतिम बलिदान
मिशन वाली रात, शौर्य विस्फोटक लेकर पुल की ओर बढ़ा। लेकिन जैसा एवलिन ने चेतावनी दी थी, विस्फोटक में तकनीकी खराबी आ गई। वह जैसे ही उसे ठीक करने झुका, उसे एहसास हुआ कि यह किसी भी क्षण फट सकता है। वह जम गया, मौत उसके सामने थी।
तभी अंधेरे से एक साया निकला—वह एवलिन थी। उसने शौर्य को जोर से धक्का देकर पीछे गिरा दिया।
“तुम यहाँ क्या कर रही हो? जाओ यहाँ से!” शौर्य चिल्लाया।
एवलिन ने कांपते हाथों से तार जोड़े और शौर्य की ओर मुड़कर आखरी बार मुस्कुराई। उसने धीमे से कहा, “आज देख लो शौर्य, बलिदान पर किसी खास खून का हक नहीं होता। मैं तुम्हें बचा रही हूँ क्योंकि तुम्हारी कविताएं इस देश की ज़रूरत हैं।”
अगले ही पल एक भयानक धमाका हुआ। शौर्य दूर जा गिरा। धुआं छंटा तो वहां सिवाय राख और मलबे के कुछ न था। एवलिन ने अपना कर्तव्य और प्रेम दोनों पूरा कर दिया था।
हृदय विदारक अंत
तड़के सुबह, जब संगठन के मुख्य संरक्षक (Main Leader) वहां पहुंचे, तो शौर्य खून से लथपथ जमीन पर बैठा था। वह व्यक्ति कोई और नहीं, एवलिन के पिता मिस्टर चटर्जी थे, जो गुप्त रूप से क्रांतिकारियों की मदद कर रहे थे।
जब मिस्टर चटर्जी ने अपनी बेटी की राख को देखा, तो वे फूट-फूट कर रो पड़े। शौर्य ने लड़खड़ाते हुए कहा, “सर, वह वीर थी… वह मुझसे बेहतर क्रांतिकारी थी।”
मिस्टर चटर्जी ने रुंधे गले से कहा, “वह यहाँ तुम्हारे पास सुरक्षा खोजने नहीं आई थी शौर्य, वह तुम्हें वह दिशा देने आई थी जो तुम्हारे अहंकार ने छीन ली थी। तुमने आज सिर्फ एक साथी नहीं, भारत की एक सच्ची बेटी को खो दिया।”
शौर्य ने अपनी जेब से वह कागज़ निकाला जिस पर उसने नई कविता लिखी थी। उसने उसे आग के हवाले कर दिया और बुदबुदाया, “जिस कलम ने एक सच्चे बलिदान को नहीं पहचाना, उसे जल जाना चाहिए।” शौर्य ज़िंदा तो था, पर उसका अहंकार उस धमाके में हमेशा के लिए दफन हो गया था। उसने आज़ादी देखी…
पर प्रेम खो दिया।
क्रांति जीत गई, पर एक हृदय हार गया।
