सिनेमा का ‘टॉक्सिक’ कल्चर: मनोरंजन या सामाजिक चुनौती?
The Palash News: Exclusive Report
भारतीय सिनेमा के बदलते दौर में ‘एंग्री यंग मैन’ की छवि अब ‘डार्क एंटी-हीरो’ में बदल चुकी है। हाल ही में यश की आगामी फिल्म ‘Toxic: A Fairy Tale for Grown-ups’ के शीर्षक और थीम ने एक नई बहस को जन्म दे दिया है। जब किसी फिल्म का नाम ही ‘टॉक्सिक’ (विषाक्त) हो, तो समाज, सरकार और सेंसर बोर्ड के लिए यह विचार करना आवश्यक हो जाता है कि मनोरंजन की आड़ में परोसी जा रही यह सामग्री हमारे सामाजिक ताने-बाने को किस दिशा में ले जा रही है।
युवाओं पर मनोवैज्ञानिक प्रभाव: एक सुपरस्टार का प्रभाव भारतीय समाज में किसी राजनेता या उपदेशक से कम नहीं होता। जब पर्दे पर नायक हिंसा, नशीले पदार्थों के सेवन और महिलाओं के प्रति आक्रामक व्यवहार को ‘स्वैग’ के साथ दिखाता है, तो युवा मन उसे वीरता का पर्याय मान लेता है। ‘टॉक्सिक मस्कुलिनिटी’ का यह महिमामंडन न केवल व्यक्तिगत व्यवहार को हिंसक बनाता है, बल्कि यह आपसी रिश्तों में सम्मान की जगह प्रभुत्व (Dominance) को स्थापित करता है।
सरकार और सेंसर बोर्ड (CBFC) के समक्ष चुनौतियाँ: अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक सुरक्षा के बीच संतुलन बनाना हमेशा से कठिन रहा है। ‘Toxic’ जैसी फिल्मों के संदर्भ में सेंसर बोर्ड और सरकार को कुछ कड़े और आधुनिक कदम उठाने की आवश्यकता है:
सटीक आयु वर्गीकरण (Nuanced Classification):सेंसर बोर्ड को केवल ‘A’ सर्टिफिकेट तक सीमित नहीं रहना चाहिए। हालिया संशोधनों के अनुसार, U/A 13+ और U/A 16+ जैसी श्रेणियों का कड़ाई से पालन होना चाहिए। ट्रेलर, जो बिना किसी रोक-टोक के यूट्यूब पर उपलब्ध होते हैं, उनके लिए डिजिटल ‘एज-गेट’ अनिवार्य करना समय की मांग है।
महिमामंडन बनाम चित्रण (Glorification vs. Depiction):सेंसर बोर्ड को यह फर्क समझना होगा कि बुराई को ‘दिखाना’ गलत नहीं है, लेकिन बुराई को ‘महान’ बनाकर पेश करना खतरनाक है। यदि ट्रेलर में अपराध या नशीले पदार्थों को सफलता के रास्ते के रूप में दिखाया जाता है, तो वहां कैंची चलाना अनिवार्य है।
सोशल मीडिया और आईटी नियम:सरकार को IT Rules 2021 के तहत सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को निर्देश देना चाहिए कि वे ‘टॉक्सिक’ या अत्यधिक हिंसक ट्रेलर के ऑटो-प्ले और सजेशन एल्गोरिदम को नियंत्रित करें, ताकि यह बच्चों की पहुंच से दूर रहे।
डिजिटल और ओटीटी सेंसरशिप: फिल्म का ट्रेलर सबसे पहले डिजिटल प्लेटफॉर्म पर आता है। ‘Toxic’ जैसी फिल्म के लिए सरकार IT Rules 2021 के तहत यह सुनिश्चित कर सकती है कि:
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एज वेरिफिकेशन (Age Verification): यूट्यूब पर ट्रेलर देखने से पहले दर्शकों का आयु सत्यापन अनिवार्य हो।
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एल्गोरिदम नियंत्रण: प्लेटफॉर्म का एल्गोरिदम इस तरह से काम करे कि हिंसक ट्रेलर छोटे बच्चों की ‘फीड’ में न आएँ।
‘सिनेमैटोग्राफ (संशोधन) विधेयक’ का उपयोग: सरकार ने हाल ही में फिल्म पायरेसी और सामग्री वर्गीकरण के लिए सख्त नियम बनाए हैं। ‘Toxic’ के ट्रेलर में यदि महिलाओं के खिलाफ हिंसा या नशीले पदार्थों को ‘ग्लेमरस’ तरीके से दिखाया गया है, तो सेंसर बोर्ड ‘U/A 13+’ या ‘U/A 16+’ जैसी नई श्रेणियों का उपयोग कर सकता है, ताकि दर्शकों को पहले से पता हो कि यह सामग्री उनके लिए है या नहीं|
रील और रीयल के बीच की रेखा :सेंसर बोर्ड यश जैसे प्रभावशाली अभिनेता से यह मांग कर सकता है कि वे फिल्म के शुरू में या अंत में एक व्यक्तिगत संदेश (Public Interest Message) दें, जिसमें वे यह स्पष्ट करें कि फिल्म के पात्र और उनका व्यवहार केवल मनोरंजन के लिए है और समाज में इसे अपनाना हानिकारक है।
सिनेमा का ‘टॉक्सिक’ कल्चर: मनोरंजन या सामाजिक चुनौती?
निष्कर्ष:सिनेमा समाज का दर्पण है, लेकिन इस दर्पण को धुंधला होने से बचाना सामूहिक जिम्मेदारी है। यदि ‘Toxic’ जैसी फिल्में समाज में संवेदनहीनता को बढ़ावा देती हैं, तो सेंसर बोर्ड को एक मूक दर्शक बनने के बजाय एक सजग रक्षक की भूमिका निभानी होगी। अंततः, कला वही श्रेष्ठ है जो समाज को जागरूक करे, न कि उसे पतन की ओर ले जाए।
