भारत बना हथियार सप्लायर! यूरोप को 8,000 करोड़ रुपये से ज्यादा का डिफेंस एक्सपोर्ट, ब्रह्मोस की भी बढ़ी मांग
भारत बना हथियार सप्लायर: हथियारों के आयात पर निर्भर रहने वाला भारत अब दुनिया के कई देशों को रक्षा उपकरण बेच रहा है। यूरोप को गोला-बारूद और आर्टिलरी शेल की सप्लाई से लेकर ब्रह्मोस मिसाइल की बढ़ती मांग तक, भारतीय रक्षा उद्योग की वैश्विक पहचान मजबूत हो रही है।
भारत अब सिर्फ दूसरे देशों से हथियार खरीदने वाला देश नहीं रहा, बल्कि वैश्विक रक्षा बाजार में अपनी जगह मजबूत कर रहा है। भारतीय रक्षा कंपनियां यूरोप सहित कई देशों को गोला-बारूद, तोप के गोले, मोर्टार शेल और आधुनिक रक्षा उपकरणों की सप्लाई कर रही हैं। वहीं, ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल की मांग दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों में भी बढ़ रही है।
रक्षा निर्यात में यह बढ़ोतरी भारत के लिए आर्थिक और रणनीतिक, दोनों लिहाज से अहम मानी जा रही है। इससे देश की रक्षा निर्माण क्षमता को बढ़ावा मिल रहा है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय हथियारों की स्वीकार्यता भी बढ़ रही है।
एक साल में यूरोप को 8,000 करोड़ रुपये से ज्यादा के हथियारों की सप्लाई
भारत के रक्षा निर्यात को लेकर सामने आए आंकड़े इस क्षेत्र में हो रहे बदलाव की ओर इशारा करते हैं। ट्रेड डेटा मॉनिटर के हवाले से दी गई जानकारी के मुताबिक, भारत से यूरोप को होने वाले रक्षा निर्यात में पिछले चार वर्षों के दौरान करीब 1,600 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है।
इस निर्यात में गोला-बारूद, आर्टिलरी और मोर्टार शेल जैसे रक्षा उत्पाद शामिल हैं। यूरोप में बढ़ती सैन्य जरूरतों और यूक्रेन युद्ध के कारण हथियारों तथा गोला-बारूद की मांग बढ़ी है। ऐसे में भारतीय कंपनियों के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में नए अवसर पैदा हुए हैं।
हालांकि, यूरोप को होने वाले निर्यात और वहां से यूक्रेन तक पहुंचने वाले हथियारों के बीच अंतर समझना जरूरी है। विशेषज्ञों के अनुसार, भारतीय कंपनियां यूरोपीय देशों को रक्षा सामग्री बेच रही हैं, जबकि इन देशों के माध्यम से यूक्रेन की जरूरतों को पूरा करने के लिए भी खरीदारी की जा सकती है।
इजराइल को भी भारत ने भेजे गोला-बारूद और विस्फोटक
भारत के रक्षा निर्यात का दायरा यूरोप तक सीमित नहीं है। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार, मार्च 2026 तक के दो वर्षों में भारत ने इजराइल को करीब 630 करोड़ रुपये के गोला-बारूद और विस्फोटक भेजे।
इन उत्पादों में तोप के गोले और मोर्टार शेल भी शामिल बताए गए हैं। रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया कि दो वर्षों में इजराइल को भेजे गए रक्षा उत्पादों का मूल्य उससे पहले के छह वर्षों के कुल निर्यात के बराबर था।
यह आंकड़ा भारतीय रक्षा उद्योग की बढ़ती उत्पादन क्षमता और अंतरराष्ट्रीय मांग को दर्शाता है। हालांकि, अलग-अलग रिपोर्टों में निर्यात की अवधि, उत्पादों की श्रेणी और आंकड़ों की गणना के आधार पर अंतर हो सकता है।
ब्रह्मोस मिसाइल की बढ़ती मांग, फिलीपींस बना पहला विदेशी ग्राहक
भारत की रक्षा निर्यात यात्रा में ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल का विशेष महत्व है। जनवरी 2022 में भारत और फिलीपींस के बीच ब्रह्मोस मिसाइल प्रणाली की आपूर्ति के लिए लगभग 375 मिलियन डॉलर यानी करीब 3,130 करोड़ रुपये का समझौता हुआ था।
इसके बाद 19 अप्रैल 2024 को फिलीपींस को मिसाइलों की पहली खेप सौंपी गई। फिलीपींस पहला विदेशी देश बना, जिसने भारत से ब्रह्मोस मिसाइल प्रणाली खरीदी।
ब्रह्मोस एक सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल है, जो आवाज की गति से भी तेज उड़ान भर सकती है। इसे जमीन और समुद्र आधारित प्लेटफॉर्म से इस्तेमाल करने के लिए विकसित किया गया है। इसकी क्षमता समुद्री सुरक्षा और तटीय रक्षा को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
22 अक्टूबर को ब्रह्मोस एयरोस्पेस के सीईओ और प्रबंध निदेशक डॉ. जयतीर्थ जोशी ने बताया कि इंडोनेशिया और वियतनाम सहित कई देशों की ओर से भी इस मिसाइल में रुचि दिखाई जा रही है। यदि इन देशों के साथ समझौते आगे बढ़ते हैं, तो भारत के रक्षा निर्यात को और मजबूती मिल सकती है।
म्यांमार भी भारत से खरीदता है बड़ी मात्रा में हथियार
स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट यानी SIPRI के आंकड़ों के अनुसार, 2000 से 2023 के बीच म्यांमार भारत से हथियार खरीदने वाले प्रमुख देशों में शामिल रहा।
उपलब्ध जानकारी में भारत के हथियार निर्यात में म्यांमार की हिस्सेदारी 31 प्रतिशत बताई गई है। हालांकि, इस आंकड़े को समझते समय यह ध्यान रखना जरूरी है कि SIPRI के हथियार हस्तांतरण संबंधी आंकड़े आमतौर पर सैन्य उपकरणों के हस्तांतरण के मूल्यांकन पर आधारित होते हैं, न कि सीधे रुपये में दर्ज व्यावसायिक बिक्री पर।
यह तथ्य दिखाता है कि भारत का रक्षा निर्यात लंबे समय से कई क्षेत्रीय देशों की सैन्य जरूरतों से जुड़ा हुआ है।
रूस ने भी भारत से खरीदा गोला-बारूद? रिपोर्ट में बड़ा दावा
रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच भारत से रूस को रक्षा सामग्री की आपूर्ति को लेकर भी चर्चा हुई। मई 2024 में प्रकाशित एक रिपोर्ट में दावा किया गया था कि रूस ने छह से आठ महीनों की अवधि में भारत से करीब 33,000 करोड़ रुपये के गोला-बारूद और अन्य रक्षा संबंधी सामान खरीदे।
रिपोर्ट में भारतीय रुपये में भुगतान किए जाने का भी दावा किया गया था। हालांकि, इस दावे की पुष्टि के लिए कोई सार्वजनिक आधिकारिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं होने की बात कही गई थी। इसलिए इसे प्रमाणित सरकारी आंकड़े के बजाय रिपोर्ट में किए गए दावे के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
तेजस फाइटर जेट को लेकर कई देशों ने दिखाई दिलचस्पी
भारत का रक्षा उद्योग केवल गोला-बारूद और मिसाइलों तक सीमित नहीं है। स्वदेशी हल्का लड़ाकू विमान तेजस भी अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारत की संभावनाओं का अहम हिस्सा है।
हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड यानी HAL द्वारा निर्मित तेजस को लेकर मलेशिया सहित कई देशों ने अलग-अलग समय पर रुचि दिखाई है। इनमें अर्जेंटीना, मिस्र, ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका, इंडोनेशिया और फिलीपींस जैसे देशों के नाम भी सामने आए हैं।
दिसंबर 2022 में HAL के तत्कालीन अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक आर. माधवन ने कहा था कि मलेशिया के पास लड़ाकू विमानों के कई विकल्प थे। इनमें चीन-पाकिस्तान का JF-17, दक्षिण कोरिया का FA-50 और रूस के कुछ विमान शामिल थे। इसके बावजूद तेजस ने मलेशिया की रुचि हासिल की थी।
हालांकि, किसी देश की रुचि दिखाने और अंतिम खरीद समझौता होने में अंतर होता है। इसलिए तेजस के संभावित ग्राहकों से जुड़े दावों को मौजूदा स्थिति के अनुसार अलग-अलग देखना जरूरी है।
भारत से हथियार क्यों खरीद रहे हैं दूसरे देश?
विशेषज्ञों के अनुसार, भारतीय रक्षा उद्योग की बढ़ती उत्पादन क्षमता, अपेक्षाकृत प्रतिस्पर्धी कीमतें और विभिन्न प्रकार के रक्षा उत्पादों की उपलब्धता निर्यात बढ़ने के प्रमुख कारणों में शामिल हैं।
स्वीडन स्थित SIPRI के वरिष्ठ शोधकर्ता सिमोन वेजमैन के अनुसार, यूक्रेन की जरूरतों और यूरोपीय देशों की बढ़ती मांग के कारण भारत से गोला-बारूद खरीदा जा रहा है। भारत के पास रक्षा उत्पादन का एक विकसित औद्योगिक आधार है, जो अंतरराष्ट्रीय मांग पूरी करने में मदद कर सकता है।
किंग्स कॉलेज लंदन के विशेषज्ञ वॉल्टर लाडविग ने भी इस संदर्भ में यूरोपीय देशों की भूमिका की ओर ध्यान दिलाया है। उनके मुताबिक, भारतीय कंपनियां सीधे यूक्रेन को हथियार बेचने के बजाय यूरोपीय देशों को रक्षा सामग्री की आपूर्ति कर रही हैं।
इस तरह यूरोपीय देशों के माध्यम से रक्षा सामग्री की खरीद और उसके अंतिम उपयोग के बीच अंतर बना रहता है।
विदेशी हथियारों के मुकाबले कम कीमत पर मिसाइलें देने की क्षमता
सितंबर 2026 में रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह के हवाले से कहा गया कि भारत कुछ मिसाइलों की आपूर्ति विदेशी कंपनियों की तुलना में करीब एक-चौथाई कीमत पर कर सकता है।
यदि यह लागत लाभ संबंधित उत्पादों और खरीद समझौतों में लागू होता है, तो भारत को वैश्विक रक्षा बाजार में प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त मिल सकती है। हालांकि, अलग-अलग मिसाइल प्रणालियों की कीमत उनकी तकनीक, मारक क्षमता, उपकरणों, प्रशिक्षण, रखरखाव और समझौते की शर्तों पर निर्भर करती है।
इसलिए सभी भारतीय मिसाइलों को विदेशी विकल्पों से चार गुना सस्ता मानना सही नहीं होगा।
भारत के लिए क्यों अहम है रक्षा निर्यात में बढ़ोतरी?
भारत के बढ़ते रक्षा निर्यात के कई महत्वपूर्ण फायदे हो सकते हैं। इससे घरेलू रक्षा कंपनियों को बड़े ऑर्डर मिलते हैं, उत्पादन क्षमता बढ़ती है, नई तकनीकों के विकास को प्रोत्साहन मिलता है और देश में रोजगार के अवसर पैदा हो सकते हैं।
इसके अलावा, ब्रह्मोस जैसी उन्नत मिसाइल प्रणालियों का निर्यात भारत के रणनीतिक संबंधों को मजबूत करने में भी मदद कर सकता है। इससे भारत की पहचान एक ऐसे देश के रूप में उभर रही है, जो अपनी सैन्य जरूरतों को पूरा करने के साथ-साथ दूसरे देशों को भी रक्षा उपकरण उपलब्ध करा सकता है।
निष्कर्ष
भारत का रक्षा उद्योग तेजी से बदल रहा है। यूरोप को गोला-बारूद की आपूर्ति, इजराइल को रक्षा सामग्री का निर्यात, फिलीपींस को ब्रह्मोस मिसाइलों की बिक्री और तेजस जैसे स्वदेशी लड़ाकू विमान की अंतरराष्ट्रीय संभावनाएं इस बदलाव को दर्शाती हैं।
हालांकि, रक्षा निर्यात से जुड़े आंकड़ों और अलग-अलग देशों की खरीद संबंधी खबरों की पुष्टि आधिकारिक दस्तावेजों से करना जरूरी है। इसके बावजूद इतना स्पष्ट है कि स्वदेशी रक्षा उत्पादन को बढ़ावा देने की भारत की कोशिशें वैश्विक रक्षा बाजार में उसकी भूमिका को विस्तार देने में महत्वपूर्ण साबित हो सकती हैं।
इसे भी पढ़े :-
SBI Data Leak: SBI के 3,897 ग्राहकों का डेटा डार्क वेब पर मिलने का दावा, जानें कैसे होती है साइबर ठगी |