Delhi High Court: CJP नेता सौरव दास और आशुतोष रांका ने वापस ली याचिका, हिरासत पर कोर्ट ने उठाए सवाल
Delhi High Court: कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रवक्ता सौरव दास और आशुतोष रांका ने अपनी न्यायिक हिरासत को चुनौती देने वाली याचिका दिल्ली हाईकोर्ट से वापस ले ली है। बुधवार को सुनवाई के दौरान अदालत ने याचिका पर सवाल उठाए और कहा कि पुलिस से प्रदर्शन की अनुमति मिलने का मतलब केवल प्रदर्शनकारियों को नियंत्रित करना नहीं, बल्कि अन्य लोगों को प्रदर्शन में शामिल होने से रोकना भी था। कोर्ट की टिप्पणियों के बाद दोनों नेताओं ने अपनी याचिका वापस लेने का फैसला किया।
Delhi High Court में CJP नेताओं की याचिका पर सुनवाई
दिल्ली हाईकोर्ट ने बुधवार को CJP नेताओं सौरव दास और आशुतोष रांका की याचिका पर सुनवाई की। दोनों नेताओं ने विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट के 19 अक्टूबर के आदेश को चुनौती दी थी, जिसके तहत उनकी न्यायिक हिरासत दो दिनों के लिए बढ़ा दी गई थी।
मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस सुब्रमण्यम प्रसाद ने याचिका पर सवाल उठाते हुए कहा कि दोनों नेताओं ने शांति बनाए रखने के लिए 10 अक्टूबर को बॉन्ड भरा था, लेकिन अगले ही दिन यानी 11 अक्टूबर को उसे तोड़ दिया गया।
अदालत ने यह भी सवाल किया कि जब उनकी हिरासत से जुड़े मामले में मजिस्ट्रेट के समक्ष कार्यवाही का नतीजा आना बाकी है, तो ऐसे में हाईकोर्ट को तत्काल उनकी याचिका पर विचार क्यों करना चाहिए।
प्रदर्शन की अनुमति को लेकर कोर्ट की अहम टिप्पणी
सुनवाई के दौरान अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी प्रदर्शन के लिए पुलिस की अनुमति का अर्थ केवल प्रदर्शन करने वालों को रोकना नहीं होता। इसका उद्देश्य यह भी सुनिश्चित करना है कि दूसरे लोग उस प्रदर्शन में शामिल होकर कानून-व्यवस्था की स्थिति को प्रभावित न करें।
कोर्ट ने इस संदर्भ में फ्रांस में हुए छात्र-नेतृत्व वाले प्रदर्शन का भी जिक्र किया, जिसके दौरान स्थिति बिगड़ने और आगजनी व लूटपाट जैसी घटनाओं की बात सामने आई थी। अदालत की टिप्पणी का मुख्य जोर इस बात पर था कि सार्वजनिक प्रदर्शनों के दौरान शांति और कानून-व्यवस्था बनाए रखना बेहद जरूरी है।
मजिस्ट्रेट के आदेश को दी गई थी चुनौती
सौरव दास और आशुतोष रांका ने विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट के 19 अक्टूबर के आदेश की वैधता पर सवाल उठाए थे। उनके वकील अभिक चिमनी ने दलील दी कि मजिस्ट्रेट के पास उनकी हिरासत बढ़ाने का अधिकार नहीं था।
हालांकि, सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने सुझाव दिया कि पहले विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट की अदालत में चल रही कार्यवाही का परिणाम देखा जाना चाहिए। यदि वहां से शिकायत या कानूनी आपत्ति बनी रहती है, तो संबंधित पक्ष उचित कानूनी उपाय अपना सकते हैं।
गौरतलब है कि दशहरा की छुट्टियों के कारण दिल्ली हाईकोर्ट उस सप्ताह बंद था। इसी वजह से मामले की सुनवाई छुट्टी के दिन की गई। दोनों नेताओं की याचिका पर विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट की अदालत में भी सुनवाई होनी थी।
आगे क्या होगा?
दिल्ली हाईकोर्ट से याचिका वापस लिए जाने के बाद अब मामले में विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट की अदालत में होने वाली कार्यवाही महत्वपूर्ण होगी। हिरासत बढ़ाने के आदेश और मजिस्ट्रेट के अधिकारों को लेकर उठाए गए सवालों पर आगे की कानूनी प्रक्रिया से स्थिति स्पष्ट हो सकती है।
फिलहाल, इस मामले में आगे की कार्रवाई संबंधित अदालत की कार्यवाही और उसके आदेशों पर निर्भर करेगी।
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