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भारत-बांग्लादेश संबंधों के बदलते आयाम

mr.raazsingh.rs
Last updated: 2025/12/27 at 9:18 PM
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7 Min Read
भारत-बांग्लादेश संबंधों के बदलते आयाम
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भारत-बांग्लादेश संबंधों के बदलते आयाम

एक विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण:

भूमिका भारत और बांग्लादेश के संबंध केवल दो पड़ोसी देशों के बीच के औपचारिक राजनयिक संबंध नहीं हैं, बल्कि ये साझा इतिहास, संस्कृति और नियति के धागों से बुने हुए हैं। वर्तमान में बांग्लादेश जिस राजनीतिक संक्रमण और अस्थिरता के दौर से गुजर रहा है, उसने इन संबंधों के समक्ष नई और जटिल चुनौतियां पेश की हैं। प्रस्तुत है इस विषय पर एक विस्तृत विश्लेषण।

Contents
भारत-बांग्लादेश संबंधों के बदलते आयाम एक विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण:प्रस्तावना: ‘स्वर्ण युग’ से अनिश्चितता के मोड़ तक1. राजनीतिक संक्रमण और कूटनीतिक पुनर्गठन2. सुरक्षा और रणनीतिक चिंताएं3. आर्थिक सहयोग और कनेक्टिविटी का भविष्य4. अनसुलझे मुद्दे: तीस्ता और सीमा प्रबंधन5. जन-केंद्रित कूटनीति (People-to-People Ties)भारत द्वारा उठाए जा सकने वाले आवश्यक कदमनिष्कर्ष: भारत-बांग्लादेश संबंधों के बदलते आयाम

प्रस्तावना: ‘स्वर्ण युग’ से अनिश्चितता के मोड़ तक

वर्ष 1971 के मुक्ति संग्राम में भारत की भूमिका ने बांग्लादेश के साथ संबंधों की जो नींव रखी थी, वह पिछले 15 वर्षों के “शेख हसीना युग” में अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँची। इसे अक्सर द्विपक्षीय संबंधों का ‘स्वर्ण युग’ (Golden Era) कहा गया। लेकिन अगस्त 2024 में शेख हसीना के पदत्याग और उसके बाद बनी मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार ने इन संबंधों को एक अनिश्चित मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है। आज भारत के लिए चुनौती केवल एक नई सरकार के साथ तालमेल बिठाना नहीं है, बल्कि दक्षिण एशिया में अपनी रणनीतिक बढ़त को बनाए रखना भी है।


1. राजनीतिक संक्रमण और कूटनीतिक पुनर्गठन

भारत के लिए बांग्लादेश की राजनीति हमेशा से ‘अवामी लीग’ बनाम ‘बीएनपी-जमात गठबंधन’ के ध्रुवीकरण में उलझी रही है। शेख हसीना के शासनकाल में भारत को एक ऐसा भरोसेमंद साथी मिला था जिसने भारत की सुरक्षा चिंताओं (विशेषकर पूर्वोत्तर के उग्रवाद) को प्राथमिकता दी।

  • संस्थागत संबंधों की ओर: वर्तमान स्थिति में भारत का रुख अब व्यक्ति-केंद्रित कूटनीति से हटकर संस्थागत संबंधों (Institutional Relations) की ओर मुड़ रहा है। भारत को अब बांग्लादेश की सेना, नागरिक समाज और उभरते छात्र आंदोलनों के साथ नए सिरे से संवाद स्थापित करना होगा।

2. सुरक्षा और रणनीतिक चिंताएं

भारत के लिए बांग्लादेश की भौगोलिक स्थिति ‘चिकन नेक’ (Siliguri Corridor) की सुरक्षा के लिहाज से अत्यंत महत्वपूर्ण है।

  • उग्रवाद का डर: पिछले दशक में बांग्लादेश ने भारतीय विद्रोही समूहों को अपनी धरती से खदेड़ दिया था। अब अस्थिरता के माहौल में यह डर फिर से पैदा हो गया है कि क्या जमात-ए-इस्लामी जैसे संगठन फिर से सक्रिय होकर भारत विरोधी गतिविधियों को बढ़ावा देंगे?

  • चीन और पाकिस्तान का प्रभाव: बांग्लादेश में शक्ति के निर्वात (Power Vacuum) का लाभ उठाकर चीन अपनी पैठ बढ़ा सकता है। इसके अलावा, पाकिस्तान के साथ बांग्लादेश की बढ़ती नजदीकी भारत की ‘घेराबंदी’ की आशंकाओं को जन्म देती है।

3. आर्थिक सहयोग और कनेक्टिविटी का भविष्य

बांग्लादेश, दक्षिण एशिया में भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार है।

  • परियोजनाओं की निरंतरता: पिछले वर्षों में रेल, सड़क और जलमार्ग कनेक्टिविटी के दर्जनों प्रोजेक्ट्स शुरू हुए। इनमें ‘मैत्री सेतु’ और ‘अगरतला-अखाउरा रेल लिंक’ प्रमुख हैं। आर्थिक मजबूरी के कारण बांग्लादेश इन परियोजनाओं को पूरी तरह बंद नहीं कर पाएगा, क्योंकि ये उसकी अपनी विकास दर के लिए भी आवश्यक हैं।

  • ऊर्जा कूटनीति: भारत द्वारा बांग्लादेश को की जा रही बिजली आपूर्ति और ‘मैत्री सुपर थर्मल पावर प्रोजेक्ट’ जैसे निवेश दोनों देशों को एक-दूसरे पर निर्भर बनाते हैं। यह निर्भरता तनावपूर्ण संबंधों में भी एक ‘बफर’ का काम करती है।

4. अनसुलझे मुद्दे: तीस्ता और सीमा प्रबंधन

बदलते दौर में पुराने घाव फिर से हरे हो सकते हैं।

  • तीस्ता जल समझौता: यह मुद्दा दशकों से लंबित है। अंतरिम सरकार और भविष्य की कोई भी चुनी हुई सरकार इस पर भारत को घेरने की कोशिश करेगी। भारत को इस पर एक लचीला और स्वीकार्य समाधान ढूंढना होगा।

  • सीमा सुरक्षा (BSF vs BGB): सीमा पर होने वाली मौतों और अवैध घुसपैठ के मुद्दे अक्सर बांग्लादेश में भारत-विरोधी भावनाओं को भड़काते हैं। आने वाले समय में सीमा प्रबंधन को और अधिक मानवीय (Humanitarian) बनाने की आवश्यकता होगी।

5. जन-केंद्रित कूटनीति (People-to-People Ties)

भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती बांग्लादेशी युवाओं के बीच बढ़ती ‘भारत-विरोधी’ लहर को शांत करना है। छात्रों के नेतृत्व में हुए आंदोलन ने भारत को शेख हसीना के करीब देखा, जिससे आम जनता में नाराजगी पैदा हुई। भारत को अब अपनी ‘सॉफ्ट पावर’ का उपयोग करके छात्र नेताओं, बुद्धिजीवियों और युवाओं के साथ सीधा संवाद करना होगा। वीजा सेवाओं की बहाली और शैक्षणिक सहयोग इसमें सेतु का काम कर सकते हैं।


भारत द्वारा उठाए जा सकने वाले आवश्यक कदम

  1. संवेदनशील और सम्मानजनक कूटनीति: भारत को बांग्लादेश की आंतरिक राजनीति में किसी भी प्रकार की पक्षधरता से बचते हुए, लोकतांत्रिक मूल्यों और संस्थागत स्थिरता के प्रति संतुलित समर्थन देना चाहिए।

  2. आर्थिक साझेदारी को गहराई देना: अवसंरचना, ऊर्जा, डिजिटल कनेक्टिविटी और स्टार्टअप सहयोग में भारत को अधिक आकर्षक और व्यावहारिक प्रस्ताव देने होंगे।

  3. क्षेत्रीय सहयोग को सुदृढ़ करना: BIMSTEC, BBIN और ‘एक्ट ईस्ट पॉलिसी’ के माध्यम से भारत बांग्लादेश को क्षेत्रीय विकास का केंद्रीय भागीदार बना सकता है।

  4. जन-कूटनीति (People-to-People Diplomacy): शिक्षा, संस्कृति, स्वास्थ्य और पर्यटन के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाकर भारत को बांग्लादेशी समाज के साथ भावनात्मक जुड़ाव मजबूत करना चाहिए।

  5. सुरक्षा सहयोग में विश्वास निर्माण: आतंकवाद, साइबर सुरक्षा और समुद्री सुरक्षा जैसे साझा खतरों पर सहयोग को पारदर्शी और परस्पर सम्मान आधारित बनाना आवश्यक है।


निष्कर्ष: भारत-बांग्लादेश संबंधों के बदलते आयाम

भारत और बांग्लादेश के संबंध वर्तमान में ‘प्रतीक्षा करो और देखो’ (Wait and Watch) की स्थिति में हैं। भारत को अपनी ‘पड़ोसी प्रथम’ (Neighborhood First) नीति के तहत धैर्य और व्यावहारिकता का परिचय देना होगा। यह सच है कि राजनीतिक चेहरे बदल सकते हैं, लेकिन भूगोल नहीं बदलता।

भारत का उद्देश्य एक ‘स्थिर, धर्मनिरपेक्ष और समृद्ध’ बांग्लादेश होना चाहिए, क्योंकि अस्थिर बांग्लादेश का सबसे पहला और गहरा प्रभाव भारत की सुरक्षा और अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। आने वाले महीने यह तय करेंगे कि यह ‘नया अध्याय’ आपसी विश्वास की बहाली का होगा या स्थायी दूरी का।


संपादकीय विश्लेषण: The Palash News

झारखंड सरकार की बड़ी पहल: – पेसा कानून को कैबिनेट की मंजूरी। अब आदिवासियों को मिलेगा जल जंगल जमीन का अधिकार।

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