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झारखण्ड के ‘सदान’ : झारखंडी संस्कृति के प्रमुख स्तंभ

Amanda Nidhi
Last updated: 2025/12/19 at 1:00 PM
Amanda Nidhi
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6 Min Read
झारखण्ड के 'सदान' : झारखंडी संस्कृति के प्रमुख स्तंभ
झारखण्ड के 'सदान' : झारखंडी संस्कृति के प्रमुख स्तंभ
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झारखण्ड के ‘सदान’ : झारखंडी संस्कृति के प्रमुख स्तंभ

‘झारखण्ड‘ शब्द ही यह दर्शाता है कि यह एक ऐसा भूभाग है जहाँ जंगल-झाड़ी की बहुलता है। इसके साथ ही, जो इस राज्य को एक अलग पहचान प्रदान करती है, वह है यहाँ की अपनी विशेषताएँ। इन्हीं विशेषताओं के कारण झारखण्ड राज्य की माँग की गई थी, और इन्हीं विशेषताओं में यहाँ के जनजातीय और ‘सदानों’ की मिली-जुली संस्कृति समाहित है। अब यह प्रश्न उठता है कि ‘जनजाति’ की परिभाषा से तो हर कोई वाकिफ है, परंतु ये ‘सदान’ कौन हैं?

Contents
झारखण्ड के ‘सदान’ : झारखंडी संस्कृति के प्रमुख स्तंभI) भाषा एवं साहित्य का विकास (Development of Language and Literature)II) लोक कला और संगीत (Folk Art and Music):निष्कर्ष: झारखण्ड के ‘सदान’ : झारखंडी संस्कृति के प्रमुख स्तंभ

‘सदान’ शब्द की उत्पत्ति नागपुरी भाषा से मानी जाती है, जहाँ ‘सदपरवा’ घर में रहने वाले कबूतर को कहा जाता था। ‘सदपरवा’ से ‘सदान’ शब्द की उत्पत्ति हुई, जिसका अर्थ है कि जिस प्रकार घर में रहने वाले कबूतर जनजातियों के साथ-साथ रहते थे, उसी प्रकार सदान भी जनजातियों के साथ घुले-मिले रहते आए हैं।

परिभाषा:

‘सदान’ शब्द का तात्पर्य झारखण्ड के वे गैर-जनजातीय मूल निवासी हैं जो प्राचीन काल से यहीं की भूमि से जुड़े रहे हैं। ये समुदाय सदियों से छोटानागपुर क्षेत्र में बसते आए हैं और उन्होंने यहाँ की जनजातियों के साथ एक अनूठी समन्वय संस्कृति (Composite Culture) का निर्माण किया है।

निवास एवं ऐतिहासिकता के आधार पर: सदान की पहचान उन्हें आदिवासियों और दिकुओं (ब्रिटिश काल से आए शोषक ‘बाहरी लोग’ जैसे ‘महाजन-ठेकेदार’ आदि) से अलग करती है। निवास एवं ऐतिहासिकता के आधार पर हम सदानों को दो भागों में बाँट सकते हैं:

I) मूल सदान (Original Sadan): ये ऐसे लोग हैं जो आदिवासियों से पूर्व यहाँ निवास करते थे। ऐसे सदानों में मुख्यतः शिल्पकार और छोटे व्यवसायी शामिल थे, जैसे- कोयरी, तेली, लोहार, कुम्हार, रैयती आदि जैसे लोग।

झारखण्ड के 'सदान' : झारखंडी संस्कृति के प्रमुख स्तंभ
झारखण्ड के ‘सदान’ : झारखंडी संस्कृति के प्रमुख स्तंभ

II) नागवंशी शासकों या विभिन्न शासकों द्वारा लाकर बसाए गए लोग: कुछ शासकों द्वारा अपने आस-पास के क्षेत्रों से कुछ विद्वान (intellectual) लोगों को लाकर बसाया गया, जिसमें मुख्यतः उच्च जाति कहे जाने वाले लोग शामिल थे। इनके द्वारा कुछ नई तकनीक लाई गई जिससे कृषि, कला, साहित्य, कारीगरी, व्यवसाय सबमें एक अच्छा प्रभाव देखने को मिला।

भाषाई पहचान: सदानों की सबसे बड़ी पहचान उनकी क्षेत्रीय भाषाएँ हैं, जिन्हें सामूहिक रूप से ‘सदानी भाषाएँ’ कहा जाता है। इनमें प्रमुख हैं:

नागपुरी (नागपुरिया): छोटानागपुर क्षेत्र की सम्पर्क भाषा

खोरठा

कुड़माली

पंचपरगनियाँ ये भाषाएँ जनजातीय और गैर-जनजातीय दोनों समुदायों के बीच संवाद का माध्यम बनीं।

झारखण्ड की सांस्कृतिक विरासत में सदानों की भूमिका: सदानों ने झारखण्ड की सामाजिक और सांस्कृतिक विरासत को समृद्ध करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

I) भाषा एवं साहित्य का विकास (Development of Language and Literature)

नागपुरी भाषा को सदानों ने ही पोषित किया और इसे साहित्यिक रूप दिया। यह भाषा जनजातीय और गैर-जनजातियों के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान का सबसे सशक्त माध्यम बनी।

खोरठा और कुड़माली साहित्य में लोक कथाओं, गीतों और वीरगाथाओं का विशाल भंडार है।

'पर्व-त्योहार' में समन्वय! सदान समुदाय
‘पर्व-त्योहार’ में समन्वय! सदान समुदाय

II) लोक कला और संगीत (Folk Art and Music):

सदानों का योगदान क्षेत्रीय लोकनृत्य और संगीत में अतुलनीय है।

झुमर सदानों का एक प्रमुख लोक नृत्य है जो जनजातीय नृत्यों से प्रभावित है।

करमा नृत्य और पाईका नृत्य जैसी कलाएँ साझा रूप से विकसित हुईं।

वाद्य यंत्रों में मांदर, ढोल, बाँसुरी आदि का प्रयोग आदिवासी और सदानों में भी समान रूप से किया जाता है।

‘पर्व-त्योहार’ में समन्वय! सदान समुदाय ने कई प्रमुख जनजातीय पर्वों को अपनाकर या उनमें भाग लेकर सांस्कृतिक सामंजस्य को बढ़ावा दिया है।

सरहुल (फूलों का त्योहार): करमा (भाई-बहन) का त्योहार, टुसू पर्व (मकर संक्रांति) से जुड़ा पर्व एवं जितिया पर्व, ये ऐसे पर्व हैं जो जनजातीय एवं सदानों दोनों में समान उत्साह से मनाए जाते हैं।

सामाजिक सम्बन्ध और आर्थिक व्यवस्था! सदानों ने स्थानीय कृषि पद्धतियों में सुधार किया और उन्हें ‘जनजातियों’ के साथ साझा किया। साथ ही, ग्राम व्यवस्था में ‘सहयोग’ किया और स्थानीय कारीगरों तथा व्यापारियों के रूप में एक मजबूत स्थानीय आर्थिक ढाँचा बनाने में मदद की।

पृथक राज्य आंदोलन में योगदान! 20वीं सदी में जब पृथक झारखण्ड राज्य की माँग उठी तब सदान समुदायों ने भी बढ़-चढ़कर भाग लिया। इन्होंने भाषाई और सांस्कृतिक आधार पर एक झारखण्डी पहचान को मजबूत करने में भी मदद की।

निष्कर्ष: झारखण्ड के ‘सदान’ : झारखंडी संस्कृति के प्रमुख स्तंभ

सदान झारखण्ड की मिश्रित संस्कृति के आवश्यक स्तंभ हैं। उन्होंने न केवल यहाँ की भूमि को अपनी कलाओं और शिल्प से सींचा है, बल्कि अपनी भाषाओं, लोक-कलाओं और त्योहारों के माध्यम से एक ऐसा सांस्कृतिक ताना-बाना बुना है जो जनजातीय परम्पराओं से काफी घुलमिल गया है। सदानों की पहचान और उनका योगदान यह सिद्ध करता है कि झारखण्ड की संस्कृति केवल जनजातीय नहीं, बल्कि यह आदिवासी और ‘सदानी’ परम्पराओं के सह-अस्तित्व और पारस्परिक सम्मान का एक अनूठा संगम है।

Ease of Doing Business, Ease of Living for Workers और भारत की नई श्रम संहिता

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