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Nepal Flood: नेपाल में ग्लेशियर झील फटने से तबाही, भारत की 200 ‘वाटर बम’ झीलों पर मंडरा रहा बड़ा खतरा

shivani oraon
Last updated: 2026/08/31 at 5:50 PM
shivani oraon
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10 Min Read
Nepal Flood: नेपाल में ग्लेशियर झील फटने से तबाही, भारत की 200 ‘वाटर बम’ झीलों पर मंडरा रहा बड़ा खतरा
Nepal Flood: नेपाल में ग्लेशियर झील फटने से तबाही, भारत की 200 ‘वाटर बम’ झीलों पर मंडरा रहा बड़ा खतरा
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Nepal Flood: नेपाल में ग्लेशियर झील फटने से तबाही, भारत की 200 ‘वाटर बम’ झीलों पर मंडरा रहा बड़ा खतरा

Nepal Flood: नेपाल में ग्लेशियर झील फटने से तबाही, भारत की 200 ‘वाटर बम’ झीलों पर मंडरा रहा बड़ा खतरा
Nepal Flood: नेपाल में ग्लेशियर झील फटने से तबाही, भारत की 200 ‘वाटर बम’ झीलों पर मंडरा रहा बड़ा खतरा

Nepal Flood: नेपाल में भोटेकोशी और त्रिशूली नदी में आई भीषण बाढ़ ने एक बार फिर हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियर झीलों के बढ़ते खतरे की ओर ध्यान खींचा है। नेपाल-तिब्बत सीमा के पास ग्लेशियर झील के टूटने और भारी बारिश के कारण आई बाढ़ ने मध्य नेपाल के कई इलाकों में भारी तबाही मचाई है। इस आपदा में अब तक सैकड़ों लोगों की मौत और हजारों लोगों के लापता होने की खबर है।

Contents
Nepal Flood: नेपाल में ग्लेशियर झील फटने से तबाही, भारत की 200 ‘वाटर बम’ झीलों पर मंडरा रहा बड़ा खतरानेपाल में बाढ़ से भारी तबाहीभारत के हिमालयी क्षेत्र में भी 200 के करीब खतरनाक झीलेंकिन राज्यों में सबसे ज्यादा संवेदनशील झीलें?नेपाल या सिक्किम की झील फटी तो बिहार-बंगाल तक पहुंच सकता है असरअनियंत्रित निर्माण ने बढ़ाया खतरा200 संवेदनशील झीलों के लिए तैयार हो रहा है एक्शन प्लानदो साल में हाई रिस्क झीलों पर सेंसर नेटवर्क का लक्ष्यनेपाल की जलविद्युत परियोजनाओं को भी बड़ा नुकसाननेपाल को करीब 4.5 अरब डॉलर का आर्थिक नुकसाननेपाल की त्रासदी भारत के लिए भी चेतावनीNepal Flood: जाल में फंसी 5 साल की बच्ची बची, बाढ़ में खो गया पूरा परिवार

सबसे चिंता की बात यह है कि नेपाल में जिस तरह की ग्लेशियर झील के टूटने से तबाही हुई, वैसी ही 195 से 200 के करीब उच्च जोखिम वाली ग्लेशियर झीलें भारतीय हिमालयी क्षेत्र में भी मौजूद हैं। इन झीलों को विशेषज्ञ प्राकृतिक ‘वाटर बम’ मानते हैं। अगर भारी बारिश, भूस्खलन या किसी अन्य प्राकृतिक कारण से इनका पानी अचानक बाहर निकलता है, तो कुछ ही समय में बड़े इलाके में बाढ़ और मलबे का सैलाब आ सकता है।

नेपाल में बाढ़ से भारी तबाही

नेपाल-तिब्बत सीमा के संवेदनशील इलाकों में ग्लेशियर टूटने के बाद भोटेकोशी और त्रिशूली नदी का जलस्तर तेजी से बढ़ा। बाढ़ और भूस्खलन ने मध्य नेपाल के कई जिलों को प्रभावित किया है। प्रभावित आठ जिलों से अब तक 768 शव बरामद किए जाने की जानकारी सामने आई है, जबकि 2,500 से अधिक लोग अब भी लापता बताए जा रहे हैं।

स्थिति अभी भी पूरी तरह सामान्य नहीं हुई है। रुक-रुककर हो रही भारी बारिश और तिब्बत में नदी के उद्गम क्षेत्र के पास नई अस्थायी झील बनने की खबरों ने चिंता बढ़ा दी है। भोटेकोशी नदी का जलस्तर दोबारा बढ़ने के कारण निचले इलाकों में हाई अलर्ट जारी किया गया है।

Nepal Flood: नेपाल में ग्लेशियर झील फटने से तबाही, भारत की 200 ‘वाटर बम’ झीलों पर मंडरा रहा बड़ा खतरा
Nepal Flood: नेपाल में ग्लेशियर झील फटने से तबाही, भारत की 200 ‘वाटर बम’ झीलों पर मंडरा रहा बड़ा खतरा

भारत के हिमालयी क्षेत्र में भी 200 के करीब खतरनाक झीलें

राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण यानी NDMA के अनुसार भारतीय हिमालयी क्षेत्र की 11 प्रमुख नदी घाटियों में करीब 28,000 ग्लेशियर झीलें मौजूद हैं। इनमें लगभग 7,500 झीलें भारतीय क्षेत्र में हैं। अकेले गंगा बेसिन में 4,700 से ज्यादा ग्लेशियर झीलें बताई गई हैं।

इनमें से करीब 195 से 200 झीलों को उच्च जोखिम वाली श्रेणी में रखा गया है। इन झीलों के फटने से अचानक Glacial Lake Outburst Flood यानी GLOF आ सकती है।

GLOF की स्थिति में ग्लेशियर झील का पानी अचानक भारी मात्रा में नीचे की ओर बहता है। इसके साथ चट्टान, मिट्टी और मलबा भी तेजी से नीचे आता है। पहाड़ी इलाकों में इसका असर कुछ ही समय में नदियों और निचले क्षेत्रों तक पहुंच सकता है।

किन राज्यों में सबसे ज्यादा संवेदनशील झीलें?

उच्च जोखिम वाली ग्लेशियर झीलें हिमालय के कई राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में मौजूद हैं।

  • हिमाचल प्रदेश – 48 झीलें
  • सिक्किम – 40 झीलें
  • लद्दाख – 35 झीलें
  • अरुणाचल प्रदेश – 28 झीलें
  • जम्मू-कश्मीर – 26 झीलें
  • उत्तराखंड – 13 झीलें

इन क्षेत्रों में सतलुज, ब्यास, चिनाब, तीस्ता, सिंधु, ज़ांस्कर, दिबांग, सुबनसिरी, झेलम, अलकनंदा और भागीरथी जैसी नदियों के बेसिन विशेष रूप से संवेदनशील माने जाते हैं।

नेपाल या सिक्किम की झील फटी तो बिहार-बंगाल तक पहुंच सकता है असर

ग्लेशियर झीलों का खतरा केवल पहाड़ी क्षेत्रों तक सीमित नहीं है। अगर नेपाल या सिक्किम क्षेत्र में किसी बड़ी ग्लेशियर झील के टूटने से अचानक भारी मात्रा में पानी नीचे आता है, तो इसका असर मैदानी इलाकों तक पहुंच सकता है।

कोसी, गंडक और तीस्ता जैसी नदियों के जरिए भारी मात्रा में पानी और गाद उत्तर बिहार और उत्तर बंगाल के इलाकों में पहुंच सकती है। इससे सुपौल, सहरसा, मधुबनी, चंपारण जैसे जिलों और उत्तर बंगाल के जलपाईगुड़ी, सिलीगुड़ी तथा दार्जिलिंग के तराई क्षेत्रों में बाढ़ और तटबंध टूटने का खतरा बढ़ सकता है।

यही वजह है कि हिमालयी ग्लेशियर झीलों की निगरानी को अब केवल पहाड़ी राज्यों की समस्या नहीं, बल्कि पूरे नदी तंत्र और मैदानी आबादी की सुरक्षा से जोड़कर देखा जा रहा है।

अनियंत्रित निर्माण ने बढ़ाया खतरा

नेपाल और तिब्बत के कुछ संवेदनशील क्षेत्रों में पर्यावरणीय और भौगोलिक परिस्थितियों को नजरअंदाज करके निर्माण कार्य होने से भी आपदा का प्रभाव बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।

नदियों के प्राकृतिक बहाव वाले क्षेत्रों में बस्तियां और निर्माण होने पर बाढ़ के पानी और मलबे को बाहर निकलने के लिए पर्याप्त जगह नहीं मिलती। ऐसे में अचानक आई बाढ़ ज्यादा विनाशकारी हो सकती है।

इसके अलावा समय पर प्रभावी Early Warning System (EWS) उपलब्ध नहीं होने से भी लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाने में परेशानी बढ़ सकती है।

200 संवेदनशील झीलों के लिए तैयार हो रहा है एक्शन प्लान

भारत में उच्च जोखिम वाली ग्लेशियर झीलों को लेकर अब निगरानी और रोकथाम की दिशा में काम किया जा रहा है। करीब 200 संवेदनशील झीलों के लिए Hazard Zone Mapping की जा रही है, ताकि यह पता लगाया जा सके कि किसी झील के टूटने की स्थिति में कितने इलाके पर खतरा हो सकता है।

इसके आधार पर संवेदनशील क्षेत्रों में निर्माण और अनियोजित बसावट को नियंत्रित करने की योजना बनाई जा रही है।

इसके अलावा झीलों के मुहाने पर चेक डैम, ड्रेनेज सिस्टम और पानी के बहाव को नियंत्रित करने वाले डिफ्लेक्शन स्ट्रक्चर तैयार करने पर भी जोर दिया जा रहा है।

दो साल में हाई रिस्क झीलों पर सेंसर नेटवर्क का लक्ष्य

उच्च जोखिम वाली ग्लेशियर झीलों की निगरानी के लिए सैटेलाइट तकनीक के साथ-साथ जमीन पर सेंसर नेटवर्क तैयार करने की योजना है। लक्ष्य है कि अगले दो वर्षों में सभी उच्च जोखिम वाली झीलों पर ऑटोमैटिक अर्ली वार्निंग सेंसर लगाए जाएं।

इससे झील के जलस्तर, तापमान और अन्य महत्वपूर्ण बदलावों की लगातार निगरानी की जा सकेगी और खतरे की स्थिति में समय रहते निचले इलाकों में अलर्ट जारी किया जा सकेगा।

नेपाल की जलविद्युत परियोजनाओं को भी बड़ा नुकसान

नेपाल में आई बाढ़ का असर केवल आबादी और सड़कों तक सीमित नहीं रहा। भोटेकोशी और त्रिशूली में आई बाढ़ से कई जलविद्युत परियोजनाओं को भी नुकसान पहुंचा है।

रिपोर्ट के अनुसार नेपाल के 14 जलविद्युत संयंत्र प्रभावित हुए हैं, जिससे करीब 431 मेगावाट बिजली उत्पादन क्षमता ठप हो गई है। रसुवा और त्रिशूली की भूमिगत सुरंगों में मलबा भरने के कारण 500 से अधिक जलविद्युत कर्मचारी और श्रमिकों के लापता होने की जानकारी सामने आई है।

भारत से पहुंची 11 सदस्यीय विशेषज्ञ टीम त्रिशूली-3ए परियोजना क्षेत्र में राहत और बचाव अभियान में जुटी है।

नेपाल को करीब 4.5 अरब डॉलर का आर्थिक नुकसान

बाढ़ और भूस्खलन ने नेपाल की अर्थव्यवस्था पर भी बड़ा असर डाला है। सड़क, पुल, जलविद्युत परियोजनाओं, बुनियादी ढांचे और रिहायशी इलाकों को हुए नुकसान के बाद पुनर्निर्माण पर करीब 4.5 अरब डॉलर यानी लगभग 37,500 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है।

यह रकम नेपाल की GDP के करीब दसवें हिस्से के बराबर बताई जा रही है। ऐसे में नेपाल सरकार ने आपदा से उबरने और पुनर्निर्माण के लिए भारत समेत अंतरराष्ट्रीय समुदाय से आर्थिक सहयोग की अपील की है।

नेपाल की त्रासदी भारत के लिए भी चेतावनी

नेपाल में आई यह तबाही सिर्फ एक पड़ोसी देश की प्राकृतिक आपदा नहीं है। यह पूरे हिमालयी क्षेत्र के लिए एक गंभीर चेतावनी है। जलवायु परिवर्तन, ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने, भारी बारिश और पहाड़ी क्षेत्रों में बढ़ते निर्माण के बीच ग्लेशियर झीलों का खतरा आने वाले समय में और महत्वपूर्ण हो सकता है।

भारत के हिमालयी क्षेत्र में मौजूद करीब 200 उच्च जोखिम वाली झीलों की लगातार निगरानी, समय पर चेतावनी और मजबूत आपदा प्रबंधन व्यवस्था बेहद जरूरी है। क्योंकि अगर इन प्राकृतिक ‘वाटर बमों’ में से किसी एक का बांध अचानक टूटता है, तो इसका असर पहाड़ों से निकलकर बिहार और पश्चिम बंगाल के घनी आबादी वाले मैदानी इलाकों तक पहुंच सकता है।

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