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World Zoonoses Day: जब इंसान, जानवर और प्रकृति की सेहत एक-दूसरे से जुड़ जाती है !

Surbhi Shipra
Last updated: 2026/07/04 at 4:12 PM
Surbhi Shipra
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World Zoonoses Day
World Zoonoses Day
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World Zoonoses Day: जब इंसान, जानवर और प्रकृति की सेहत एक-दूसरे से जुड़ जाती है !

 

Contents
World Zoonoses Day: जब इंसान, जानवर और प्रकृति की सेहत एक-दूसरे से जुड़ जाती है !World Zoonoses Day क्या है?6 जुलाई ही क्यों चुना गया?World Zoonoses Day : जूनोसिस क्या है?आज यह विषय पहले से अधिक महत्वपूर्ण क्यों है?विश्व स्तर पर बढ़ती चिंतामानव, पशु और पर्यावरण: एक अविभाज्य संबंधWorld Zoonoses Day : जागरूकता ही सबसे बड़ी सुरक्षा

World Zoonoses Day क्या है?

World Zoonoses Day: हर वर्ष 6 जुलाई को पूरी दुनिया में विश्व जूनोसिस दिवस (World Zoonoses Day) मनाया जाता है। यह दिन केवल एक औपचारिक अंतरराष्ट्रीय आयोजन नहीं है, बल्कि मानव स्वास्थ्य, पशु स्वास्थ्य और पर्यावरण के बीच मौजूद उस गहरे संबंध की याद दिलाता है, जिसे लंबे समय तक अनदेखा किया गया। आज जब दुनिया कोविड-19 जैसी वैश्विक महामारी के प्रभाव से पूरी तरह उबर भी नहीं पाई है, तब यह दिवस पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो गया है।

‘जूनोसिस’ (Zoonosis) ऐसे संक्रामक रोगों को कहा जाता है, जो पशुओं से मनुष्यों में या मनुष्यों से पशुओं में फैल सकते हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार, मानवों में होने वाले अधिकांश नए संक्रामक रोगों की उत्पत्ति पशुओं से ही होती है। यही कारण है कि विश्व जूनोसिस दिवस केवल चिकित्सा विज्ञान का विषय नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य, पर्यावरण संरक्षण, कृषि, पशुपालन और वैश्विक नीति-निर्माण से जुड़ा एक महत्वपूर्ण अवसर है।

विश्व स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य की महामारी को रोकने का सबसे प्रभावी तरीका केवल बेहतर अस्पताल बनाना नहीं, बल्कि मनुष्य, पशु और प्रकृति के बीच संतुलित संबंध बनाए रखना है। यही विचार आज “वन हेल्थ (One Health)” की अवधारणा का आधार बन चुका है।

Ebola virus em World Zoonoses Day

(Image by Wikipedia)

6 जुलाई ही क्यों चुना गया?

विश्व जूनोसिस दिवस 6 जुलाई को इसलिए मनाया जाता है क्योंकि इसी दिन वर्ष 1885 में फ्रांसीसी वैज्ञानिक Louis Pasteur ने पहली बार सफलतापूर्वक रेबीज़ (Rabies) का टीका एक मानव को लगाया था। यह चिकित्सा विज्ञान के इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक मानी जाती है।

जिस बच्चे का उपचार किया गया था, उसे एक संक्रमित कुत्ते ने काट लिया था और उसके जीवित बचने की संभावना अत्यंत कम थी। पाश्चर द्वारा विकसित वैक्सीन ने न केवल उस बच्चे का जीवन बचाया, बल्कि आने वाले समय में लाखों लोगों को रेबीज़ जैसी घातक बीमारी से सुरक्षा प्रदान करने का मार्ग भी प्रशस्त किया।

इसी ऐतिहासिक उपलब्धि की स्मृति में विश्व जूनोसिस दिवस मनाया जाता है। यह दिवस विज्ञान, अनुसंधान और सार्वजनिक स्वास्थ्य के महत्व को रेखांकित करता है तथा यह संदेश देता है कि समय रहते की गई वैज्ञानिक खोजें मानव सभ्यता को बड़े संकटों से बचा सकती हैं।

World Zoonoses Day : जूनोसिस क्या है?

जूनोसिस ऐसे रोग हैं जिनके कारक—जैसे वायरस, बैक्टीरिया, परजीवी या फफूंद—जानवरों और मनुष्यों दोनों को संक्रमित कर सकते हैं।

इनका संक्रमण कई माध्यमों से हो सकता है—

  • संक्रमित पशु के सीधे संपर्क से।
  • पशुओं के काटने या खरोंचने से।
  • दूषित भोजन या पानी के माध्यम से।
  • मच्छर, टिक या अन्य कीटों के जरिए।
  • पशु अपशिष्ट या संक्रमित वातावरण के संपर्क से।

यह धारणा गलत है कि केवल जंगली जानवर ही ऐसे रोग फैलाते हैं। गाय, भैंस, बकरी, सूअर, मुर्गी, कुत्ता, बिल्ली और अन्य पालतू पशु भी कुछ परिस्थितियों में संक्रमण का स्रोत बन सकते हैं। हालांकि इसका अर्थ यह नहीं कि पशु मनुष्यों के शत्रु हैं। अधिकांश संक्रमण अस्वच्छ परिस्थितियों, अपर्याप्त निगरानी, खराब पशुपालन व्यवस्था और पर्यावरणीय असंतुलन के कारण फैलते हैं।

आज यह विषय पहले से अधिक महत्वपूर्ण क्यों है?

पिछले तीन दशकों में दुनिया ने कई ऐसे संक्रामक रोगों का सामना किया है जिनकी उत्पत्ति पशुओं से हुई। इनमें SARS, MERS, Nipah, Bird Flu, Swine Flu, Ebola तथा कोविड-19 जैसे संक्रमणों ने वैश्विक स्वास्थ्य व्यवस्था को गंभीर चुनौती दी।

विशेषज्ञों का मानना है कि इसके पीछे कई कारण हैं—

तेजी से बढ़ता शहरीकरण, जंगलों की कटाई, वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास में मानव हस्तक्षेप, जलवायु परिवर्तन, अंतरराष्ट्रीय यात्रा, पशु व्यापार तथा बदलती कृषि प्रणालियाँ ऐसे कारक हैं जिन्होंने मनुष्य और वन्यजीवों के बीच दूरी को कम कर दिया है। परिणामस्वरूप ऐसे वायरस, जो पहले केवल पशुओं तक सीमित थे, अब मनुष्यों तक पहुँचने लगे हैं।

यही कारण है कि विश्वभर की सरकारें अब महामारी की रोकथाम को केवल स्वास्थ्य मंत्रालय की जिम्मेदारी नहीं मानतीं, बल्कि पशुपालन, वन, पर्यावरण, कृषि और वैज्ञानिक अनुसंधान संस्थानों के समन्वय को भी समान रूप से आवश्यक समझती हैं।

विश्व स्तर पर बढ़ती चिंता

अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य संगठनों के अनुसार, मानवों में उभरने वाले अधिकांश नए संक्रामक रोग जूनोटिक प्रकृति के होते हैं। यह स्थिति केवल विकासशील देशों तक सीमित नहीं है। विकसित देशों में भी पशुपालन, वन्यजीव संपर्क, जलवायु परिवर्तन और वैश्विक यात्रा के कारण संक्रमण का जोखिम बना रहता है।

विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि यदि प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन, अवैध वन्यजीव व्यापार और पर्यावरणीय क्षरण जारी रहा, तो भविष्य में नई महामारियों की संभावना और बढ़ सकती है। इसलिए विश्व जूनोसिस दिवस केवल जागरूकता अभियान नहीं, बल्कि वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा की दिशा में सामूहिक जिम्मेदारी का प्रतीक है।

मानव, पशु और पर्यावरण: एक अविभाज्य संबंध

कई वर्षों तक स्वास्थ्य नीति मुख्यतः मनुष्यों के उपचार तक सीमित रही। लेकिन आधुनिक विज्ञान ने स्पष्ट कर दिया है कि मानव स्वास्थ्य को पशुओं और पर्यावरण से अलग करके नहीं देखा जा सकता।

यदि पशुओं में किसी संक्रामक रोग की समय रहते पहचान नहीं होती, तो वही संक्रमण आगे चलकर मनुष्यों में फैल सकता है। इसी प्रकार यदि जंगल नष्ट होंगे, जैव विविधता घटेगी और जलवायु असंतुलित होगी, तो नए रोगजनकों के उभरने की संभावना भी बढ़ेगी।

इसी सोच ने वैश्विक स्तर पर “वन हेल्थ” की अवधारणा को जन्म दिया, जिसके अनुसार मानव, पशु और पर्यावरण की सेहत एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हुई है। आज विश्व जूनोसिस दिवस इसी समग्र दृष्टिकोण को मजबूत करने का अवसर भी है।

World Zoonoses Day : जागरूकता ही सबसे बड़ी सुरक्षा

किसी भी महामारी से लड़ने का पहला और सबसे प्रभावी हथियार जागरूकता है। यदि लोग पशुओं के साथ सुरक्षित व्यवहार, स्वच्छता, समय पर टीकाकरण, सुरक्षित भोजन और स्वास्थ्य संबंधी सावधानियों को अपनाएँ, तो अनेक जूनोटिक रोगों को फैलने से रोका जा सकता है।

ग्रामीण क्षेत्रों में पशुपालकों, डेयरी किसानों, पशु चिकित्सकों और वन क्षेत्रों में कार्य करने वाले कर्मचारियों को विशेष प्रशिक्षण देने की आवश्यकता है। वहीं शहरी क्षेत्रों में पालतू पशुओं की नियमित स्वास्थ्य जांच और टीकाकरण भी उतना ही आवश्यक है।

विश्व जूनोसिस दिवस हमें यह समझाता है कि स्वास्थ्य केवल अस्पतालों में नहीं, बल्कि खेतों, जंगलों, पशु आश्रयों, प्रयोगशालाओं और हमारे दैनिक व्यवहार में भी सुरक्षित होता है।

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