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Motivational Talkसंपादकीय

बचपन की डोर

mr.raazsingh.rs
Last updated: 2025/12/19 at 12:47 PM
mr.raazsingh.rs
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8 Min Read
बचपन की डोर
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🪁 बचपन की डोर: एक पतंग ने बच्चों में भर दी नई जान

आज की भागदौड़ भरी ज़िंदगी में, जहाँ गैजेट्स ने हमारे घरों पर राज कर लिया है, वहाँ खुले आसमान के नीचे, धूप में खेलने का मज़ा क्या होता है, यह बात हम भले ही भूल चुके हैं। लेकिन, बच्चों के लिए यह मज़ा आज भी उतना ही ज़रूरी है, जितना कभी हमारे बचपन में हुआ करता था।

Contents
🪁 बचपन की डोर: एक पतंग ने बच्चों में भर दी नई जान📱 गैजेट्स का ग्रहण और स्वास्थ्य का विरोधाभास🪁 पतंग का जादू: एक घंटे का वह स्वर्णिम पल🌟 रोबोट नहीं, ये बच्चे हैं🤔 निष्कर्ष: बचपना अनमोल है, अभी मैं जवान हूँ

मेरी पत्नी, बच्चों के साथ खेलने की एक बड़ी प्रेमी है। वह न केवल उनके खेल में शामिल होती है, बल्कि उनकी छोटी-छोटी भावनाओं की भी बड़ी क़द्र करती है। हमारी पाँच साल की बेटी को घर के अंदर और बाहर दोनों जगह खेलना बेहद पसंद है, लेकिन जब मैं अपने आस-पास देखता हूँ, तो गली-मोहल्ले के बच्चे मुझे लगभग ‘रोबोट’ से बने हुए लगते हैं – अपनी-अपनी डिजिटल दुनिया में खोए हुए, सामाजिक मेल-जोल से दूर।

मेरी पत्नी का मानना है कि हमारी बेटी को गिल्ली-डंडा, कंचे, पिट्टू और कबड्डी जैसे गली-मोहल्ले के सारे पारंपरिक खेल पता होने चाहिए, जो कभी हमारी पहचान हुआ करते थे। मगर, बच्चों को एक जगह इकट्ठा करना ही आजकल सबसे बड़ी चुनौती बन गया है।

📱 गैजेट्स का ग्रहण और स्वास्थ्य का विरोधाभास

आज के बच्चों को देखकर मन में कई सवाल उठते हैं। मुझे समझ नहीं आता कि उन्हें क्या हो गया है! उन्हें दही से तो सर्दी हो जाती है, पर कोल्ड ड्रिंक और आइसक्रीम वे जमकर खाते हैं। फल से उनको एलर्जी हो गई है, और फ़ास्ट फ़ूड वे आसानी से पचा लेते हैं। क्या हमारी सोच बदल गई है, या हमारा शरीर? या यूँ कहें कि दिल और दिमाग की हरकतें आपस में मेल ही नहीं खातीं। हम बचपन से किताबों में सारी अच्छी बातें पढ़ते तो हैं, पर किताब बंद करते ही दिमाग की बत्ती भी गुल हो जाती है। यह विरोधाभास हमें एक अजीब से चौराहे पर खड़ा कर देता है।

एक तरफ़, हम उन्हें दुनिया की सबसे अच्छी शिक्षा देना चाहते हैं, और दूसरी तरफ़, हम उन्हें उस सहज, शारीरिक और सामाजिक शिक्षा से दूर कर रहे हैं, जो खेल के मैदान में मिलती है। हम चाहते हैं कि वे जल्द से जल्द समझदार हो जाएँ, पर हम यह भूल जाते हैं कि वे अपनी उम्र के हिसाब से पूरी तरह समझदार हैं, और उन्हें जल्दी बड़ा बनाने की होड़ में हम उनका अनमोल बचपना उनसे छीन रहे हैं।

🪁 पतंग का जादू: एक घंटे का वह स्वर्णिम पल

इन्हीं विचारों के बीच, आज मेरी पत्नी ने बरसों बाद मेरी बेटी और अपने भाई के बेटे के लिए कुछ रंग-बिरंगी पतंगें खरीदीं। मेरा बचपन पतंगबाजी से भरा रहा है, सो मैंने बड़ी ललक से उन पतंगों को उड़ाने के लिए तैयार किया।

शाम को, मैं अपनी बेटी और भतीजे के साथ छत पर पहुँचा, और पतंग उड़ाना शुरू किया। करीब एक घंटे तक मैं बच्चों के साथ पतंग उड़ाता रहा और उनकी छोटी-छोटी सफलता पर तालियाँ बजाता रहा। मेरी इस ‘बचकाना’ गतिविधि पर मेरे पड़ोस के बच्चों की नज़र पड़ी।

उनके आश्चर्य का ठिकाना न था। वे फुसफुसाते हुए कहने लगे, “यह पतंग कोई बच्चा नहीं, बल्कि ‘गीत’ के पापा उड़ा रहे हैं!” उनके लिए यह एक अनूठा दृश्य था। बच्चों को लगा, एक ‘बड़ा’ भी बच्चों के खेल को इतने उत्साह से खेल सकता है।

धीरे-धीरे, उनके भीतर की जिज्ञासा और खेल की सहज भूख जाग उठी। एक के बाद एक बच्चे मेरी बेटी से बात करने लगे, “मुझे भी पतंग उड़ानी है!”

देखते ही देखते, कई बच्चे मेरे घर की छत पर इकट्ठा हो गए। वे सभी मज़े से खेल रहे थे, हँस रहे थे, पतंग की डोर को पकड़ने की कोशिश कर रहे थे। उस एक घंटे में, मैं उनकी निर्दोष ख़ुशी में अपना बचपन फिर से जी रहा था।

🌟 रोबोट नहीं, ये बच्चे हैं

ये बच्चे, जिन्हें मैं ‘रोबोट’ समझने लगा था, एक पतंग के धागे ने उनमें जान सी फूँक दी थी। उनके चेहरों पर जो चमक थी, वह किसी वीडियो गेम को जीतने से नहीं आ सकती। मेरी पत्नी भी यही चाहती थी कि बच्चे घर से बाहर निकलें, धूप में खेलें, एक-दूसरे से मिलें और आगामी मकर संक्रांति पर्व की तैयारी करें। पतंग का यह विचार, मेरी पत्नी का यह प्रयास, पूरी तरह से काम कर गया।

आज मुझे यह बात गहराई से समझ आई कि बच्चे सिर्फ बच्चों के साथ ही नहीं, बल्कि बड़ों के साथ भी खेलना पसंद करते हैं।

दिक्कत बच्चों में नहीं, बल्कि हम बड़ों में है। हम अपनी ‘बहुत बिजी’ होने का चोला ओढ़कर, बच्चों की दुनिया से दूर हो गए हैं। हम उनकी ख़ुशी किस बात में है, यह जानना ही नहीं चाहते। हम सिर्फ उन्हें ‘उपलब्धियाँ’ हासिल करते देखना चाहते हैं, न कि उन्हें सहज रूप से विकसित होते हुए।

🤔 निष्कर्ष: बचपना अनमोल है, अभी मैं जवान हूँ

आज के अनुभव का एक गहरा निष्कर्ष यह है कि बच्चे आज भी बच्चे हैं और कल भी बच्चे थे। उनके स्वभाव में कोई मूलभूत बदलाव नहीं आया है। बदलाव आया है हम बड़ों में।

बड़े कल बड़े थे और आज बूढ़े हो गए हैं। शायद इसीलिए हममें अपने बच्चों को जल्दी से समझदार और बड़ा करने की एक अजीब-सी होड़ लगी हुई है, क्योंकि शायद हम बूढ़े हो रहे हैं और हमें जल्द से जल्द सहारा चाहिए।

लेकिन मैं ऐसा नहीं सोचता। यह सोच सही नहीं है।

हमें यह याद रखना होगा कि बच्चे का बचपन उसका सबसे अनमोल खजाना है, और हम बड़ों का यह दायित्व है कि हम उन्हें वह समय दें, वह खेल का मैदान दें, और वह साथ दें जो उनके सहज विकास के लिए ज़रूरी है।

बच्चों को उनके हाल पर छोड़ने के बजाय, हमें ख़ुद उनके हाल में शामिल होना होगा। हमें यह भूलना नहीं चाहिए कि हमारी उम्र चाहे कुछ भी हो, दिल से तो हम भी वही बच्चा हैं जिसने कभी गिल्ली-डंडा, कंचे और पतंग उड़ाई थी।

अगर आप एक बार अपने फ़ोन को दूर रखकर, अपने बच्चों के खेल में शामिल होंगे, तो आप महसूस करेंगे कि: “अभी तो मैं जवान हूँ!” और बच्चों की ऊर्जा आपको भी जवान बनाए रखेगी।

आइए, गैजेट्स को छोड़कर, एक बार फिर खुले आसमान के नीचे निकलें, और अपने बच्चों के साथ मिलकर, अपनी ज़िंदगी की डोर को हवा में एक बार फिर ऊँचाई दें।


— ‘गीत’ के पापा (एक गौरवान्वित और जवान पिता)

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