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Jharkhand News: राज्य गठन के 26 साल बाद भी कच्चे घर में रहने को मजबूर आदिवासी परिवार, राशन से लेकर आवास तक योजनाओं से वंचित

shivani oraon
Last updated: 2026/09/08 at 4:47 PM
shivani oraon
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Jharkhand News: राज्य गठन के 26 साल बाद भी कच्चे घर में रहने को मजबूर आदिवासी परिवार, राशन से लेकर आवास तक योजनाओं से वंचित
Jharkhand News: राज्य गठन के 26 साल बाद भी कच्चे घर में रहने को मजबूर आदिवासी परिवार, राशन से लेकर आवास तक योजनाओं से वंचित
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Jharkhand News: राज्य गठन के 26 साल बाद भी कच्चे घर में रहने को मजबूर आदिवासी परिवार, राशन से लेकर आवास तक योजनाओं से वंचित

Jharkhand News: राज्य गठन के 26 साल बाद भी कच्चे घर में रहने को मजबूर आदिवासी परिवार, राशन से लेकर आवास तक योजनाओं से वंचित
Jharkhand News: राज्य गठन के 26 साल बाद भी कच्चे घर में रहने को मजबूर आदिवासी परिवार, राशन से लेकर आवास तक योजनाओं से वंचित

सारठ में गरीबी की मार झेल रहा सोनू मरांडी का परिवार, चार छोटे बच्चों के भविष्य पर भी संकट

देवघर/सारठ: झारखंड राज्य के गठन को 26 वर्ष बीत चुके हैं। राज्य बनने के पीछे आदिवासी समाज, गरीबों और वंचित तबकों के सामाजिक और आर्थिक उत्थान का बड़ा उद्देश्य था। सरकारें बदलीं, कई कल्याणकारी योजनाएं शुरू हुईं, लेकिन आज भी कुछ परिवार ऐसे हैं जिन तक बुनियादी सुविधाएं नहीं पहुंच सकी हैं।

Contents
Jharkhand News: राज्य गठन के 26 साल बाद भी कच्चे घर में रहने को मजबूर आदिवासी परिवार, राशन से लेकर आवास तक योजनाओं से वंचितसारठ में गरीबी की मार झेल रहा सोनू मरांडी का परिवार, चार छोटे बच्चों के भविष्य पर भी संकटमिट्टी के एक कमरे में गुजर रही छह लोगों की जिंदगीबच्चों के पास पर्याप्त कपड़े नहीं, शिक्षा और पोषण भी चुनौतीरौशनी हांसदा बोलीं- मेरे पास पहनने के लिए सिर्फ एक साड़ीराशन कार्ड नहीं, आवास योजना का लाभ भी नहीं मिलामजदूरी से चल रहा घर, आर्थिक संकट और गहरासरकारी योजनाओं की पहुंच पर उठ रहे सवालपंचायत प्रतिनिधि ने कहा- परिवार की स्थिति बेहद खराबआखिर इस परिवार की मांग क्या है?26 साल बाद भी बुनियादी सुविधाओं का इंतजारPM Fasal Bima Yojana: फसल बीमा के लिए अब किसान ID होगी जरूरी, पेपरलेस होगी पूरी प्रक्रिया; जानें क्या होगा फायदाCNT Act Kya Hai? Chotanagpur Tenancy Act 1908 की पूरी जानकारी

देवघर जिले के सारठ प्रखंड की लगवां पंचायत से सामने आई एक ऐसी ही तस्वीर सरकारी योजनाओं के जमीनी क्रियान्वयन पर सवाल खड़े करती है। बगजोरिया और पीठलापुल गांव के बीच झाड़ियों के झुरमुट में मिट्टी के एक छोटे से कच्चे घर में सोनू मरांडी का छह सदस्यीय परिवार बेहद कठिन परिस्थितियों में जीवन गुजार रहा है।

परिवार के सामने सिर्फ गरीबी की समस्या नहीं है, बल्कि दो वक्त की रोटी, बच्चों के कपड़े, शिक्षा, राशन और सुरक्षित मकान जैसी बुनियादी जरूरतें भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई हैं।

Jharkhand News: राज्य गठन के 26 साल बाद भी कच्चे घर में रहने को मजबूर आदिवासी परिवार, राशन से लेकर आवास तक योजनाओं से वंचित
Jharkhand News: राज्य गठन के 26 साल बाद भी कच्चे घर में रहने को मजबूर आदिवासी परिवार, राशन से लेकर आवास तक योजनाओं से वंचित

मिट्टी के एक कमरे में गुजर रही छह लोगों की जिंदगी

सोनू मरांडी मजदूरी कर अपने परिवार का पालन-पोषण करते हैं। उनकी पत्नी रौशनी हांसदा के अनुसार परिवार में चार छोटे बच्चे हैं। इनमें सकल मरांडी की उम्र 10 वर्ष, फुलमुनि मरांडी 8 वर्ष, मीरु मरांडी 5 वर्ष और मंजू मरांडी महज 2 वर्ष की है।

छह लोगों का पूरा परिवार मिट्टी से बने एक छोटे से कच्चे कमरे में रहता है। आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर है कि परिवार के पास रात में सोने के लिए पर्याप्त बिस्तर या खटिया तक नहीं है। परिवार के सदस्य बोरा बिछाकर जमीन पर सोने को मजबूर हैं।

बच्चों के पास पर्याप्त कपड़े नहीं, शिक्षा और पोषण भी चुनौती

जिस उम्र में बच्चों को स्कूल, पोषण और बेहतर भविष्य की जरूरत होती है, उस उम्र में सोनू मरांडी के बच्चों का परिवार बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहा है।

परिवार का आरोप है कि बच्चों को नियमित रूप से शिक्षा और आंगनबाड़ी जैसी सुविधाओं का लाभ नहीं मिल पा रहा है। आर्थिक तंगी के कारण बच्चों के पास पहनने के लिए पर्याप्त कपड़े तक नहीं हैं।

यह स्थिति सिर्फ एक परिवार की आर्थिक परेशानी नहीं दिखाती, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में सरकारी योजनाओं की पहुंच और उनकी निगरानी पर भी सवाल उठाती है।

रौशनी हांसदा बोलीं- मेरे पास पहनने के लिए सिर्फ एक साड़ी

परिवार की स्थिति का सबसे भावुक पहलू रौशनी हांसदा की कहानी है। रौशनी के अनुसार उनके पास पहनने के लिए सिर्फ एक साड़ी है। वह उसी साड़ी को धोकर सुखाती हैं और सूखने के बाद दोबारा पहनती हैं।

चार छोटे बच्चों की जिम्मेदारी और घर चलाने की चुनौती के बीच रौशनी लगातार संघर्ष कर रही हैं। उनका कहना है कि कई बार घर में दो वक्त का चूल्हा जलना भी तय नहीं होता।

परिवार को कई मौकों पर अधपेट या बिना पर्याप्त भोजन के रात गुजारनी पड़ती है।

राशन कार्ड नहीं, आवास योजना का लाभ भी नहीं मिला

रौशनी हांसदा का आरोप है कि उनके परिवार तक कई महत्वपूर्ण सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं पहुंच पाया है।

परिवार के अनुसार अब तक उन्हें:

  • राशन कार्ड का लाभ नहीं मिला
  • प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत मकान नहीं मिला
  • अबुआ आवास योजना का लाभ नहीं मिला
  • बच्चों को जरूरी सुविधाएं नहीं मिल पा रहीं
  • महिला कल्याण से जुड़ी योजनाओं का लाभ भी नहीं मिला

रौशनी के मुताबिक उनकी उम्र 27 वर्ष है, लेकिन उन्हें अब तक मंईयां सम्मान योजना का लाभ भी नहीं मिल पाया है।

मजदूरी से चल रहा घर, आर्थिक संकट और गहरा

सोनू मरांडी मजदूरी कर परिवार का खर्च चलाने की कोशिश करते हैं। हालांकि परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर बनी हुई है।

रौशनी के अनुसार पति की शराब की आदत के कारण भी परिवार की आर्थिक स्थिति प्रभावित होती है। उनका आरोप है कि कई बार मजदूरी करने के बाद भी घर के खर्च के लिए पर्याप्त पैसा नहीं मिल पाता।

ऐसी स्थिति में चार छोटे बच्चों की जिम्मेदारी और घर की पूरी व्यवस्था संभालना रौशनी के लिए बड़ी चुनौती बन गया है।

सरकारी योजनाओं की पहुंच पर उठ रहे सवाल

झारखंड सरकार और केंद्र सरकार की ओर से गरीब, आदिवासी और वंचित परिवारों के लिए कई योजनाएं संचालित की जा रही हैं। इनमें राशन, आवास, महिलाओं को आर्थिक सहायता, बच्चों की शिक्षा और पोषण से जुड़ी योजनाएं शामिल हैं।

इन योजनाओं का मुख्य उद्देश्य समाज के अंतिम व्यक्ति तक सरकारी सहायता पहुंचाना है।

लेकिन जब अत्यंत जरूरतमंद परिवार तक राशन, पक्का घर और अन्य बुनियादी सुविधाएं नहीं पहुंच पातीं, तो स्वाभाविक रूप से सवाल उठता है कि योजनाओं के चयन, निगरानी और क्रियान्वयन की व्यवस्था कितनी प्रभावी है।

पंचायत प्रतिनिधि ने कहा- परिवार की स्थिति बेहद खराब

शिमला पंचायत के पंचायत समिति सदस्य रघुनंदन सिंह ने बताया कि उन्हें सोनू मरांडी के परिवार की स्थिति की जानकारी है।

उन्होंने माना कि परिवार बेहद गरीबी और बेबसी के बीच जीवन गुजार रहा है और सरकारी योजनाओं के लाभ से भी दूर है।

रघुनंदन सिंह के अनुसार परिवार को सरकारी सहायता दिलाने के लिए उनके स्तर से प्रयास किए जा रहे हैं।

आखिर इस परिवार की मांग क्या है?

सोनू मरांडी का परिवार सरकार से कोई बड़ी सुविधा या विशेष मांग नहीं कर रहा है। परिवार की जरूरतें बेहद सामान्य हैं।

उन्हें चाहिए:

  • बच्चों के लिए पर्याप्त कपड़े
  • परिवार के लिए नियमित राशन
  • दो वक्त का भोजन
  • बच्चों की शिक्षा की सुविधा
  • आंगनबाड़ी और पोषण का लाभ
  • रहने के लिए सुरक्षित और पक्का मकान

26 साल बाद भी बुनियादी सुविधाओं का इंतजार

झारखंड का गठन आदिवासी और वंचित समाज के बेहतर भविष्य की उम्मीद के साथ हुआ था। लेकिन राज्य गठन के 26 साल बाद भी अगर कोई आदिवासी परिवार मिट्टी के कच्चे घर में रहने, भोजन और कपड़ों जैसी बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष कर रहा है, तो यह गंभीर चिंता का विषय है।

सोनू मरांडी का परिवार सिर्फ एक परिवार की कहानी नहीं है। यह उन सवालों का प्रतीक है जो सरकारी योजनाओं की अंतिम व्यक्ति तक पहुंच को लेकर लगातार उठते रहे हैं।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिन योजनाओं का उद्देश्य गरीब और जरूरतमंद लोगों को मुख्यधारा से जोड़ना है, क्या उनका लाभ वास्तव में सबसे जरूरतमंद व्यक्ति तक पहुंच रहा है?

सोनू मरांडी और उनके परिवार को आज किसी बड़े सपने की तलाश नहीं है। उनकी उम्मीद सिर्फ इतनी है कि घर में रोज चूल्हा जले, बच्चों को कपड़े और शिक्षा मिले, राशन की चिंता खत्म हो और रहने के लिए एक सुरक्षित पक्का घर मिल सके।

 इसे भी पढ़े :-

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