Passport Rule 1967: क्या गैर-नागरिक को भी मिल सकता है पासपोर्ट? सरकार ने किया बड़ा खुलासा
Passport Rule 1967: क्या भारत में किसी गैर-नागरिक (Non-Citizen) को भी पासपोर्ट जारी किया जा सकता है? यह सवाल इन दिनों सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बना हुआ है। विदेश मंत्रालय की ओर से पासपोर्ट को लेकर दिए गए एक बयान के बाद लोगों के बीच कई तरह की चर्चाएं शुरू हो गईं। अब केंद्र सरकार ने इस पूरे मामले पर सफाई देते हुए स्पष्ट किया है कि पासपोर्ट अधिनियम, 1967 (Passport Act, 1967) के तहत पहले से ही ऐसे कानूनी प्रावधान मौजूद हैं। सरकार ने यह भी कहा कि पिछले 12 वर्षों में पासपोर्ट नियमों में ऐसा कोई नया बदलाव नहीं किया गया है।
क्यों शुरू हुआ विवाद?
24 जून को पासपोर्ट सेवा दिवस के अवसर पर विदेश मंत्रालय के अधिकारियों ने कहा कि पासपोर्ट मुख्य रूप से यात्रा (Travel Document) के लिए जारी किया जाने वाला दस्तावेज है, नागरिकता का अंतिम कानूनी प्रमाण नहीं।
यह बयान सामने आते ही सोशल मीडिया पर बहस शुरू हो गई। कई लोगों ने सवाल उठाया कि यदि पासपोर्ट नागरिकता का प्रमाण नहीं है, तो आखिर नागरिकता किस आधार पर तय होती है।
सरकार ने क्या दी सफाई?
सरकार ने समाचार एजेंसी एएनआई के माध्यम से स्पष्ट किया कि पासपोर्ट अधिनियम, 1967 के तहत केंद्र सरकार को विशेष परिस्थितियों में किसी विदेशी या गैर-नागरिक को भी यात्रा संबंधी दस्तावेज या पासपोर्ट जारी करने का अधिकार प्राप्त है।
सरकार के अनुसार, यह कोई नई व्यवस्था नहीं है बल्कि कई दशकों से लागू कानून का हिस्सा है। इसलिए यह कहना कि सरकार ने हाल ही में पासपोर्ट से जुड़ा कोई नया फैसला लिया है, सही नहीं है।
क्या पासपोर्ट नागरिकता साबित करता है?
सरकार का कहना है कि पासपोर्ट एक महत्वपूर्ण सरकारी दस्तावेज है, लेकिन इसका मुख्य उद्देश्य पहचान स्थापित करना और विदेश यात्रा की अनुमति देना है।
किसी व्यक्ति की भारतीय नागरिकता केवल पासपोर्ट के आधार पर तय नहीं होती। नागरिकता का निर्धारण नागरिकता अधिनियम, 1955 (Citizenship Act, 1955) और उससे जुड़े नियमों के अनुसार किया जाता है।
यानी पासपोर्ट पहचान और यात्रा का दस्तावेज है, जबकि नागरिकता का अंतिम निर्णय संबंधित कानूनों और उपलब्ध कानूनी प्रमाणों के आधार पर होता है।
अदालतें भी पहले दे चुकी हैं यह व्याख्या
सरकार ने इस मुद्दे पर पूर्व में आए न्यायिक फैसलों का भी उल्लेख किया।
- 2013 में बॉम्बे हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया था कि भारत में नागरिकता का निर्धारण नागरिकता अधिनियम, 1955 के अनुसार किया जाएगा।
- सुप्रीम कोर्ट भी अपने एक मामले की सुनवाई के दौरान कह चुका है कि आधार कार्ड नागरिकता का प्रमाण नहीं, बल्कि केवल पहचान का दस्तावेज है।
इन्हीं कानूनी व्याख्याओं के आधार पर सरकार का कहना है कि पासपोर्ट भी नागरिकता का अंतिम और निर्णायक प्रमाण नहीं माना जाता।
2019 में PIB ने भी किया था स्पष्टीकरण
सरकार की आधिकारिक संस्था प्रेस सूचना ब्यूरो (PIB) ने 20 दिसंबर 2019 को NRC और CAA से जुड़े सवालों के जवाब देते हुए कहा था कि कोई भी व्यक्ति अपनी जन्म तिथि, जन्म स्थान और अन्य वैध दस्तावेजों के आधार पर नागरिकता साबित कर सकता है।
पीआईबी ने यह भी स्पष्ट किया था कि भारत में नागरिकता देने और तय करने की प्रक्रिया नागरिकता अधिनियम, 1955 तथा नागरिकता नियम, 2009 के अनुसार संचालित होती है।
नेताओं की अलग-अलग प्रतिक्रियाएं
विदेश मंत्रालय के बयान के बाद कई राजनीतिक नेताओं ने अपनी प्रतिक्रिया दी।
राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल ने सवाल उठाया कि यदि पासपोर्ट नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं है, तो नागरिकता का निर्णायक दस्तावेज कौन-सा होगा।
भाजपा आईटी सेल प्रमुख अमित मालवीय ने कहा कि सरकार ने कोई नई नीति नहीं बनाई है, बल्कि अदालतों द्वारा पहले से स्थापित कानूनी स्थिति को दोहराया है।
वहीं, महुआ मोइत्रा ने इस मुद्दे पर सरकार की आलोचना की, जबकि प्रसिद्ध गीतकार जावेद अख्तर ने भी विदेश मंत्रालय के स्पष्टीकरण पर सवाल उठाते हुए अपनी प्रतिक्रिया सोशल मीडिया पर साझा की।
आम लोगों के लिए इसका क्या मतलब है?
इस पूरे विवाद के बीच यह समझना जरूरी है कि आम नागरिकों के लिए पासपोर्ट की उपयोगिता में कोई बदलाव नहीं हुआ है।
पासपोर्ट आज भी—
- विदेश यात्रा के लिए अनिवार्य दस्तावेज है।
- अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान का प्रमाण है।
- वीजा आवेदन में आवश्यक दस्तावेज है।
- कई सरकारी और निजी प्रक्रियाओं में पहचान के रूप में स्वीकार किया जाता है।
हालांकि, किसी व्यक्ति की भारतीय नागरिकता का अंतिम निर्धारण संबंधित कानूनों और सक्षम प्राधिकरण द्वारा उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर किया जाता है।
निष्कर्ष
पासपोर्ट को लेकर सोशल मीडिया पर चल रही बहस के बीच केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया है कि Passport Act 1967 में कोई नया बदलाव नहीं किया गया है। सरकार के अनुसार, पासपोर्ट यात्रा और पहचान का महत्वपूर्ण दस्तावेज है, लेकिन भारतीय नागरिकता का अंतिम कानूनी प्रमाण नहीं माना जाता। नागरिकता का निर्धारण Citizenship Act 1955 और उससे जुड़े नियमों के तहत किया जाता है। इस स्पष्टीकरण के बाद भी यह मुद्दा राजनीतिक और सार्वजनिक चर्चा का विषय बना हुआ है।