“ध्रुवतारा जैसी भारत-रूस की मित्रता”
मायने, महत्व और ऐतिहासिकता।
हाल ही में रूस यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने भारत-रूस सम्बन्धों को मजबूत ध्रुवतारे जैसी मित्रता की संज्ञा दी। क्या यह रूपक केवल एक काव्यात्मक अभिव्यक्ति है? या इसके कोई गूढ़ मायने और ऐतिहासिकता का जुड़ाव भी है? भारतीय सभ्यता में ध्रुवतारा को स्थिरता-विश्वसनीयता का प्रतीक माना जाता है। इसलिए विवाह, जिसे हम जन्म-जन्म का साथ मानते हैं, ध्रुवतारा की साक्षी में किया जाता है, ताकि यह रिश्ता उसी प्रकार बना रहे जिस प्रकार ध्रुवतारा की स्थिरता बनी रहती है। तो क्या भारत-रूस की मित्रता ऐसी ही स्थिर है?
300 साल पहले का इतिहास:-
सामान्यतः हम मानते हैं कि हमारे सम्बन्ध 1947 से हैं, परन्तु आपको यह जानकर हैरानी होगी कि भारत और रूस के सम्बन्ध 300 साल से भी ज्यादा पुराने हैं। 18वीं सदी में स्रोत बताते हैं कि रूसी अर्थव्यवस्था में भारतीय सामान का निर्यात 8 से 10% तक था, जो आज के लिहाज से भी कम नहीं। ध्यान देने योग्य है कि 18वीं सदी में जब मुगल सत्ता भारत में कमजोर हो रही थी और ब्रिटिश अपनी जड़ें जमा रहे थे, ऐसे समय में भारतीय व्यापारियों ने एक नए मार्ग के सहारे रूसी बंदरगाह “आस्त्राखान” तक अपनी पहुँच बनाई।
स्वाधीनता संग्राम में भी यहाँ के क्रांतिकारियों ने रूसी क्रांतिकारियों से सीधा सम्पर्क बनाया था। 1801 में पोल-नेपोलियन हगन (जिसमें रूसी जार पोल प्रथम और नेपोलियन प्लान ने कंधार के रास्ते भारत पर ब्रिटिश हुकूमत को उखाड़ फेंकने के लिए हमला करने का प्लान बनाया था, परन्तु जार की हत्या के कारण यह प्लान सफल नहीं हो पाया) यह दर्शाता है कि रूस भारत को उस समय भी सिर्फ ब्रिटिश कॉलोनी नहीं समझता था बल्कि सम्भावित पार्टनर के रूप में देखता था।

आजादी के बाद के सम्बन्ध:-
हमारे प्रथम प्रधानमंत्री “नेहरू” के काल से ही, जब हमें तकनीक की आवश्यकता थी नए भारत के निर्माण के लिए, ऐसे समय में जब पश्चिमी देश ये तकनीक हमें नहीं देना चाहते थे तब रूस सामने आया और बोकारो, भिलाई, स्टील प्लांट का निर्माण हुआ।
हमारे रक्षा सम्बन्ध भी हमेशा मजबूत रहे। 1962 के युद्ध के बाद इसमें और तेजी देखी गई, मिग फाइटर जेट का मिलना, सुखोई, क्रूज मिसाइलें, परमाणु तकनीक तथा ब्रह्मोस जैसे मिसाइलों का संयुक्त प्रौद्योगिकी विकसित होना इस स्थाई सम्बन्ध के प्रतीक हैं।

ऊर्जा और आर्थिक साझेदारी:-
रूस भारत को सस्ता तेल, गैस और ऊर्जा स्रोत उपलब्ध कराता रहा है।
ऐसा नहीं है की सिर्फ रूस ने ही अपनी दोस्ती का दम-खम दिखाया हो, भारत भी इसमें कुछ कम नहीं। ध्यान देने योग्य है की शीत युद्ध काल में जब पूरा विश्व दो ध्रुवों में बंटा था उस समय भारत ने गुटनिरपेक्ष रहना चुना। भारत की इस रणनीति का महत्वपूर्ण पहलू यह था कि वह बिना किसी पश्चिमी दबाव के रूस के साथ अपने सम्बन्धों को स्थिर रखना चाहता था। रूस-यूक्रेन युद्ध ने भी भारत की किसी भी पक्ष को अपना समर्थन नहीं दिया है। जब सभी पश्चिमी देश रूस पर आर्थिक प्रतिबंध लगा रहे हैं, भारत ने रूस से तेल के आयात को बढ़ावा दिया है। BRICS, SCO, G20 जैसे वैश्विक मंचों पर भी दोनों देश सहयोगी रहे।

रूस के राष्ट्रपति पुतिन की यात्रा का परिणाम:-
उल्लेखनीय है कि 2000 ई. से शुरू हुई यह शिखर सम्मेलन आजतक बिना किसी बाधा के संचालित हो रही है और ऐसा वार्षिक शिखर वार्ता भारत किसी अन्य देश के साथ नहीं करता।
हाल में एक दिन की पुतिन की यात्रा में पश्चिमी देशों के विरोध के बावजूद कई रणनीतिक फैसले लिए गए, जैसे अपनी मुद्रा में व्यापार को बढ़ावा देना, कुशल-अकुशल श्रेणी के श्रमिकों को भारत द्वारा रूस भेजना आदि।

🌟 प्रधानमंत्री मोदी का ‘ध्रुवतारे’ जैसा संबंध: एक रणनीतिक उद्घोष 🌟
जब हमारे माननीय प्रधानमंत्री मोदी यह उद्घोष करते हैं कि हमारी दोस्ती ‘ध्रुवतारे जैसी’ है, तो यह कथन महज़ भावनात्मक प्रगाढ़ता से कहीं अधिक गहरा अर्थ समाहित करता है।
यह दृढ़ता से स्थापित करता है कि यह अटूट संबंध न केवल स्थायी और भरोसेमंद है, बल्कि यह दिशा देने वाला एक मार्गदर्शक सिद्धांत भी है।
इस साझेदारी का सीधा लाभ भारत को रणनीतिक, आर्थिक, और ऊर्जा-सुरक्षा के मामलों में मिलता है।
अपरिपक्व रूप से, यह एक सुस्पष्ट अंतर्राष्ट्रीय सन्देश भी प्रेषित करता है कि भारत अपनी विदेश नीति में विवेकपूर्ण संतुलन और स्वायत्तता को सदैव बनाए रखेगा।
ये भी पढ़े:-
