Iran-US War Ends? 108 दिन की जंग के बाद समझौते पर सहमति, 19 जून को हो सकते हैं शांति समझौते पर हस्ताक्षर
108 दिनों की भीषण जंग के बाद क्या थमने जा रहा है ईरान-अमेरिका संघर्ष?
Iran-US War : मध्य पूर्व को हिला देने वाले ईरान-अमेरिका संघर्ष में अब बड़ा मोड़ आता दिखाई दे रहा है। करीब 108 दिनों तक चले सैन्य टकराव, मिसाइल हमलों और कूटनीतिक तनाव के बाद दोनों देशों के बीच शांति समझौते की उम्मीद जगी है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने 15 जून को घोषणा की कि अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध समाप्त करने के लिए एक समझौते को अंतिम रूप दे दिया गया है। यदि सब कुछ योजना के अनुसार रहा, तो 19 जून को स्विट्जरलैंड में इस ऐतिहासिक शांति समझौते पर हस्ताक्षर हो सकते हैं।
Iran-US War : कैसे शुरू हुई थी जंग?
संघर्ष की शुरुआत 28 फरवरी 2026 को हुई, जब अमेरिका और इजराइल ने ईरान पर बड़े पैमाने पर सैन्य कार्रवाई की। इस हमले में ईरान के कई शीर्ष सैन्य और राजनीतिक नेताओं के मारे जाने की खबरें सामने आईं।
इसके बाद ईरान ने भी जवाबी कार्रवाई शुरू कर दी। खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी ठिकानों, सैन्य अड्डों और रणनीतिक परिसंपत्तियों को निशाना बनाया गया। वहीं इजराइल और अमेरिका की ओर से भी लगातार सैन्य हमले जारी रहे।
देखते ही देखते यह संघर्ष पूरे मध्य पूर्व की स्थिरता के लिए बड़ा खतरा बन गया।
होर्मुज स्ट्रेट बना संघर्ष का सबसे बड़ा केंद्र
पूरे युद्ध के दौरान होर्मुज जलडमरूमध्य सबसे संवेदनशील मुद्दा बना रहा। दुनिया के बड़े हिस्से का तेल व्यापार इसी समुद्री मार्ग से गुजरता है।
अमेरिका लगातार होर्मुज को खुला रखने की मांग करता रहा, जबकि ईरान ने कई बार इसे दबाव के हथियार के रूप में इस्तेमाल करने के संकेत दिए। इस वजह से वैश्विक ऊर्जा बाजारों में भी भारी अस्थिरता देखने को मिली।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि होर्मुज पूरी तरह बंद हो जाता, तो अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों में अभूतपूर्व उछाल आ सकता था।
युद्ध के दौरान बढ़ा अंतरराष्ट्रीय दबाव
जैसे-जैसे संघर्ष लंबा खिंचता गया, दुनिया भर के देशों ने शांति की अपील शुरू कर दी। चीन, पाकिस्तान और कई अन्य देशों ने मध्यस्थता की कोशिशें तेज कर दीं।
कई दौर की बातचीत, युद्धविराम प्रस्तावों और कूटनीतिक बैठकों के बावजूद शुरुआती महीनों में कोई ठोस समाधान नहीं निकल पाया। हालांकि मई के अंत और जून की शुरुआत में वार्ताओं में तेजी आई और दोनों पक्षों के बीच संवाद के नए रास्ते खुले।
पाकिस्तान की मध्यस्थता बनी अहम
इस पूरे घटनाक्रम में पाकिस्तान की भूमिका भी चर्चा का विषय रही। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ, सेना प्रमुख आसिम मुनीर और गृह मंत्री मोहसिन नकवी ने कई बार ईरानी नेतृत्व के साथ बातचीत की।
विश्लेषकों का मानना है कि दोनों पक्षों के बीच संवाद बनाए रखने में पाकिस्तान ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिसके बाद शांति समझौते का रास्ता साफ होता दिखाई दिया।
भारत पर भी पड़ा संघर्ष का असर
ईरान-अमेरिका टकराव का असर भारत पर भी देखने को मिला। खाड़ी क्षेत्र में मौजूद भारतीय नागरिकों और समुद्री मार्गों पर काम कर रहे भारतीय नाविकों की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ गई थी।
संघर्ष के दौरान विभिन्न घटनाओं में भारतीय नागरिकों की मौत की खबरें भी सामने आईं। इसके बाद भारत सरकार ने क्षेत्र में मौजूद भारतीयों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए लगातार निगरानी बनाए रखी।
क्या वास्तव में खत्म हो जाएगी जंग?
हालांकि शांति समझौते की घोषणा सकारात्मक संकेत मानी जा रही है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि अंतिम हस्ताक्षर और समझौते के वास्तविक क्रियान्वयन तक स्थिति पूरी तरह सामान्य नहीं मानी जा सकती।
ईरान, अमेरिका और इजराइल के बीच मौजूद गहरे रणनीतिक मतभेद अभी भी चुनौती बने हुए हैं। इसलिए आने वाले दिनों में सभी की नजर 19 जून को प्रस्तावित शांति समझौते पर रहेगी।
निष्कर्ष
करीब 108 दिनों तक चले संघर्ष ने मध्य पूर्व, वैश्विक अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा व्यवस्था को प्रभावित किया। अब यदि प्रस्तावित समझौता सफल होता है, तो यह न केवल ईरान और अमेरिका के लिए बल्कि पूरी दुनिया के लिए राहत की खबर साबित हो सकता है।
फिलहाल दुनिया की नजरें स्विट्जरलैंड में होने वाले संभावित शांति समझौते पर टिकी हैं, जो आने वाले समय में मध्य पूर्व की राजनीति और वैश्विक शक्ति संतुलन को नई दिशा दे सकता है।